मर सा गया
एक एहसास था जो मर सा गया,
दिल ये हस्सास था सिहर सा गया,
बेश कीमत था एक मरासिम जो,
हाँ बहुत ख़ास था जिगर सा गया,
हम समझते थे उसको नूर-ए-नज़र,
उसका एक पास था गुज़र सा गया,
सिर्फ़ ग़फ़लत थी इक मसर्रत की,
ग़म भरा लिबास था,उतर सा गया,
उसको अब कौन कहने जाता है,
रेत की प्यास था,बिखर सा गया...
उर्मिला माधव
7.9.2017..
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