नज़्म--बहुत देखा जहां जाना

बहुत देखा जहां जाना ,कभी मेरी गली आना,

दर-ओ-दीवार गलियों के,बहुत सीलन भरे होंगे,
मगर वो तीरगी के साए में, डरकर छुपे होंगे,

जो बर्ग-ए-गुल मुख़ातिब हो,तो आंसू देखना उसके,
बदन में आबले होंगे ,महज़ ग़म पूछना उसके,

ये मेरी ज़िंदगी जो अब तलक पुर ख़ार ज़िन्दां है,
मेरे ग़म से मेरे रब की भी दुनियां,ख़ास वीरां है,

चमन वीरां,सहन वीरां,लगे रूह-ओ-ज़ेहन वीरां,
बहे आँखों से जो दरिया लगे गंग-ओ-जमन वीरां,

यहाँ आब-ओ-हवा शम्स-ओ-क़मर को दूर रखती है,
मसर्रत के जहां में ख़ास कर माज़ूर रखती है ,

तो ज़ेरे आसमां लो रात भर तुम भी गुज़ारो तो,
बड़ी शिद्दत से हिम्मत से सितारों को पुकारो तो,

अगर आवाज़ ख़ाली लौट कर आये तो बतलाना,
हुआ महसूस कैसा इस तरह,बेकार चिल्लाना,
उर्मिला माधव

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