इशारा है

ख़ताएँ आपकी हैं रंज ओ ग़म हमारा है,
समझ सकें तो यही ख़ास इक इशारा है.

हमें है ख़ब्त यूं ही ग़मज़दा ही रहने का,
तुम्हीं बताओ तुम्हें हमने कब पुकारा है.

किसी भी वक़्त तुम्हें वक़्त ही नहीं रहता,
तुम्हें समझ ही नहीं इसमें जो ख़सारा है..

हमारे पास है परचम फ़क़त बुलंदी का,
हमारी उम्र तो ख़ल्वत का इक इदारा है..

हमारी आंख में ठहरा हुआ है इक सागर,
मज़ा तो ये है यही ज़ीस्त का सहारा है..
उर्मिला माधव
24.9.2020

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