मानी कहाँ
इल्तिज़ा उसने मेरी मानी कहाँ,
पर मिरे भी सब्र का सानी कहाँ,
कांपती आवाज़ में रोका किये,
उसने वो आवाज़ पहचानी कहाँ,
सूखती है ये सरापा भीग कर,
इश्क़ की बुनियाद में पानी कहाँ,
मैंने उसके हाल पर छोड़ा उसे,
हो सकी तब कोई मनमानी कहाँ,
उर्मिला माधव...
30.8.2014...
Comments
Post a Comment