पसीना आ गया

जिसपे दुनियां को पसीना आ गया,
मुझको आसानी से जीना आ गया,

है अजब सा वाक़या पर सच भी है,
ग़ैर के ज़ख्मों को सींना आ गया,

मेरी आँखों में अजब तासीर थी,
चल के साहिल पे सफ़ीना आ गया,

लोग छाती पीट कर क्यूँ रो गये
क्या मोहर्रम का महीना आ गया?

ज़िन्दगी पाकर सभी यूँ खुश हुए,
जैसे हाथों में नगीना आ गया...
उर्मिला माधव,

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