आरज़ू थी प्यार की

टूट ही रहा था दिल,आरज़ू थी प्यार की,
सुनी तलक नहीं गई बात सोग़वार की,

हसरतें लिए हुए,गए किसीके दर पे हम,
गले मिलीं हमें वहां रंजिशें बहार की,

फट गई थी ओढ़नी जो अश्क़ पोंछते हुए,
उसने ये सिला दिया ,और तार-तार की,

लाश अपने जिस्म की,लिए हुए मज़ार तक,
गम ज़दा रहे के बस ,ज़ीस्त शर्म सार की,

ख़ैर अपनी ज़िंदग़ी को एक ये सबक हुआ,
राह ख़ुद चुनेंगे अब ,जीत की या हार की,

प्यार मांगते फिरें यूँ झोलियाँ पसार कर,
ज़हमतें उठाएंगे न अब ये बार-बार की...
#उर्मिलामाधव...
1.7.2015..

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