खरे हैं
हम जहन्नुम से निकल कर आए हैं,बिलकुल खरे हैं,
कुछ तो ऐसे ज़ख़्म हैं जो आज भी अब भी हरे हैं,
इस क़दर हमने तपिश ख़ुर्शीद की बरदाश्त की है,
ग़ैर मुमकिन है समझना…...जीते जी हैं या मरे हैं...
वक़्त के यक़ता मनाज़िर देख कर हमने कहा,
सच बताना आईने क्या हम कभी तुझसे डरे हैं ?
दिल खंगाला तो तुम्हे, कुछ वक़्त तो लग जाएगा,
फिर भी इतना जान लोगे हम ख़यालों से परे हैं,
उर्मिला माधव
14.6.2017
Comments
Post a Comment