कभी जोरों से चिल्लाना
मुझे गुज़रे ज़माने की वो दुनिया याद आती है,
कभी ज़ोरों से चिल्लाना,
कभी बहना से लड़ जाना,
कभी अम्मां से डर जाना,
कभी बारिश से घबराना,
कभी वो हंस के बल खाना,
कभी रो रो के मर जाना,
कभी इतना नहीं जाना,
ज़रा बालों का सुलझाना,
जो चुन्नी ओढ़ कर जाना,
कहीं रस्ते में गिर जाना,
बिना चुन्नी के घर आना,
कलेजा धक् से कर जाना,
तो फिर अम्मां से डर जाना,
बगल वालों के घर जाना,
बिना ही बात इतराना,
पति के घर चले आना,
जहाँ हर कोई अनजाना,
अचानक सब समझ जाना
ज़माने भर का ग़म खाना,
पिता के घर का बिसराना,
फिर आंसू आँख में आना,
ज़माना फिर ज़माना है,
मुझे गुज़रे ज़माने की वो दुनिया याद आती है.....
उर्मिला माधव....
26.6.2014..
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