आवाज़ न छीनो
पंछी की आवाज़ न छीनो,
उसकी वो परवाज़ न छीनो,
उड़ता है उन्मुक्त गगन में,
उसका वो अन्दाज़ न छीनो,
पिंजरे के अंदर एक पन्छी,
मन ही मन मुरझा जाता है,
उसके गीत झुलस जाते हैं,
उसका साज़ बिखर जाता है,
कितना आहत है मन उसका,
कोई नहीं समझ पाता है....
उर्मिला माधव..
21.6.2013
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