छेड़ दी सरगम
हम तो भूले हुए थे उसका गम,
जाने ये किसने छेड़ दी सरगम
वो तरन्नुम सा याद आने लगा,
जैसे फूलों पे गिर गई शबनम,
जिसकी आवाज़ की ख़नक से कभी,
मिटने लगते थे सभी दर्द-ओ-अलम,
उसकी नादानियों का क्या कहना,
उसने समझा ही नहीं,लफ्ज़-ए-सनम,
हम पसे परदा-ए-हिज़ाब सही,
आबरू रखता कभी कम से कम....
उर्मिला माधव
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