गद्दारों में

लफ़्ज़ लिखे और टांग दिए दीवारों में,
अपनी गिनती रखी नहीं फनकारों में,

ख़ुद पढ़ते हैं ख़ुद ही खुश हो जाते हैं,
नाम हमारा छपा नहीं अख़बारों में,

हमने अपने दर्द सुनाये क़ातिल को,
रुसवा उसने किया खुले बाज़ारों में,

घर को फूँका और तमाशा देख लिया,
कितना ऊंचा नाम हुआ दिलदारों में,

दिए जला कर रखा किये दीवारों पर,
रस्ता चलते रहे मगर अंधियारों में ,

इतने दानिशमंद कहाँ दुनिया वाले,
वफ़ा ढूंढने निकले हम गद्दारों में,
उर्मिला माधव...
27.7.2014...

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