सन्नाटा था,

रात थी सन्नाटा था,
और मेरे ज़ेहन में
हर लम्हा ख़याल आता था,
गुफ़्तगू उनकी रही रात,
भला किस-किस से,
मैंने दस्तक दी,कई बार,
वहां जा-जा कर,
कौन आया,और कौन लौट गया,
उनको मसरूफ़ियत में होश न था,
मेरे शफ्फाक़ दिल पै
दाग़ कहीं लगते रहे,
रात के तीन बजे,
एक बजर चिल्लाया,
जाओ सो जाओ,तुम्हें,
नींद नहीं आती क्या ?
मैंने पूछा ये बताओ के,
मुहब्बत में कहाँ धोका है ?
उर्मिला माधव....
17.6.2016

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