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Showing posts from January, 2026

बात होती है

हमारी उनसे हर इक रोज़ बात होती है, अगर वो आएं नहीं सोज़ रात होती है  हमारे सुर भी कोई, ऐसे वैसे थोड़ी हैं, ख़ुदा की शान में ज़रदोज़ नात ही है 

दिल जले महबूब की बांहों का कोई क्या करे

दिलजले महबूब की बांहों का कोई क्या करे?? खार से लिपटी हुयी राहों का कोई क्या करे?? एक हसरत के लिए..दुनिया नज़र अंदाज़ हो,  इस क़दर बहकी हुयी चाहों का कोई क्या करे?? ग़र्क़ हो ऐसी मुहब्बत,जो ख़ुशी को छीन ले  बर्फ होती,सर्द सी....आहों का कोई क्या करे, जो वफ़ा के नाम पर.....सूली चढा दे दार पर, उस अहद के बदगुमां,शाहों का कोई क्या करे?? कर दिए ज़ंजीर जिसने....ज़िन्दगी के रास्ते, फिर भला ऐसी सिपह्गाहों का कोई क्या करे??  उर्मिला माधव... 18.10.2013..

आपने पत्थर उठाया

आपने पत्थर उठाया फेंक कर मारा ज़ुरूर, हम ही शर्मिंदा हैं क्यों ये लग नहीं पाया हुज़ूर, ख़ैर जाने दीजिए,ग़म छोड़िये इस बात का, फिर मशक़्क़त कीजिये ऑ फेंकिये फिर बा शऊर, दीजिये इसको मुआफ़ी, यूँ भी ये पथ्थर सा है, काम पथ्थर सा करेगा,इसमें इसका क्या कुसूर, उर्मिला माधव, 30.1.2017

डर गए हो तुम

मेरे जी से उतर गए हो तुम, दिल मिरा ग़म से भर गए हो तुम, वो जो जुरअत न  कर सका कोई वो ही जुरअत तो कर गए हो तुम, ख़ामियों से तुम्हारी वाकिफ़ हूँ, मैंने समझा के डर गए हो तुम, मेरी ख़ामोशियां ही बेहतर हैं, सच तो ये है के मर गए हो तुम, उर्मिला माधव

तीर अब दिल पर चलाना छोड़ दे

तीर अब दिल पर चलाना छोड़ दे  अपनी खातिर एक ख़ाना छोड़ दे, मैक़दों में आना जाना भूल कर, हंस ज़रा दिल का जलाना छोड़ दे, क्यूँ रहे खुशियों से यूँ महरूम तू, होश में आ लड़खड़ाना छोड़ दे, ग़म है अव्वल,ज़िन्दगी की राह में, इसलिए ख़ुद को सताना छोड़ दे, एक तू क्या हर कोई हलकान है, मान भी जा अब बहाना छोड़ दे, चश्म-ए-गिरियाँ ऑ कलेजा तर-ब-तर, चाक़ दामन ,सब गिनाना छोड़ दे, ग़म ग़लत कर जा कहीं तन्हाई में, जा-ब-जा,ग़म का सुनाना छोड़ दे, गर यूँ ही रोना है तो जी भर के रो, या कि फिर शम्मा जलाना छोड़ दे, इक ज़रा सी बात मेरी मान ले, मुफ्त के सदमे उठाना छोड़ दे... #उर्मिलामाधव... 27.1.2o16

उसकी हस्ती

उसकी हस्ती मुझसे कब ख़ाली रही, मेरे संग संग ....,उसकी दीवाली रही, कोई भी हक़दार उसका कब रहा, बिन मेरे बस उसकी बदहाली रही, उर्मिला माधव, 26.1.2017

ये तो ज़ाहिर है वो बिल्कुल बे वफ़ा है

ये तो ज़ाहिर है,वो बिलकुल बे-वफ़ा है, हाँ मगर दिल का अलहदा फ़लसफ़ा है, क्यूँ किसी इन्सान का शिकवा करूँ मैं, गम मेरी तक़दीर का अव्वल सफ्हा है, बारहा तन्हाइयां हैं,बारहा वीरां सफ़र भी, क्या समझते हो महज पहली दफा है?? रंजिशें जमकर निभायीं वक़्त ने भी,  ज़िन्दगी में हर कोई मुझसे खफा है, वक़्त की...महबूब की,तक़दीर की या, आप सब बतलाइये किसकी ज़फा है??  उर्मिला माधव... 27.1.2014..

खामोशियां

मेरी खामोशियां पढ़ना उसे हरगिज़ नहीं आया, कि मेरा दिल भी अब उठने लगा है उसकी दुनिया से उर्मिला माधव

आपने जो भी हमें ग़म दिए हम उसके तरफ़दार नहीं

आपने जो भी हमें ग़म दिए हम उसके तरफ़ दार नहीं  आपको कैसे ये लगता है कि हम आपके बीमार नहीं, आप जो कुछ भी जताते हैं हमें सिर्फ़ अदा लगती है, हम आज तक भी सनम आपकी उल्फ़त के क़र्ज़दार नहीं, उर्मिला माधव

समझने निकले

हम ऐसे लोग भी दुनिया को समझने निकले, ये कहां इल्म था हम ज़ख़्म से सजने निकले, ख़बर किसे थी नए ज़ख़्म से सजने निकले,

इधर उधर गए

ज़िंदगी के रास्ते में,सब इधर-उधर गए, आस-पास चल रहे थे वो किधर-किधर गए? ज़लज़लों की धार से,न बच सका कोई कहीं, साथ वाले काफिले भी,सब बिखर बिखर गए, बात ख़ास ये रही कि,उलझनें बनी रहीं, मुश्किलों की मार से बहुत सिहर-सिहर गए, जो चराग़ आँधियों में जल सके जला किये, तीरगी का ज़ोर था कि,हम जिधर-जिधर गए, शाख-शाख जल रही थी,जंगलों की आग से, देखते ही रह गए कि जल शजर-शजर गए, उर्मिला माधव... 21.1.2014

ख़ारिश के तहत

एक मतला ---- हर तमाशा चल रहा है,एक साज़िश के तहत, ज़ह्र दिल में पल रहा है,एक खारिश के तहत.... उर्मिला माधव... 21.1.2015

प्यार का जाम पियो

प्यार का जाम पियो,गर जो पिला दे कोई, इतना एहसास रहे......ग़म न बढ़ा दे कोई... ख़ुद पस-ए-पर्दा रहो, धूल बहुत उड़ती है, अपनी ठोकर से कहीं ख़ाक उड़ा दे कोई, सांस तरतीब से आ जाये के इतना तो रहे, दर्द क्या कम है के कुछ और हवा दे कोई, उर्मिला माधव..

बड़े हो जाओ

तुम किसी ग़ैर की ख़ातिर भी खड़े हो जाओ, काम रुतबे से न लो दिल से बड़े हो जाओ, उर्मिला माधव 

अच्छा हुआ के हमको तजरिबात

अच्छा हुआ कि हमको तजरुबात हो गए वरना गधों की शक्ल में क्या–क्या न पूछते उर्मिला माधव 

लफ़्ज़ों का करें हैं

खूब कारोबार लफ़्ज़ों का करें हैं, दूसरों के घर में,जो झाँका करें हैं तीलियां रख्खें हैं मुठ्ठी मैं दबाकर, राख़ में चिंगारियां झोंका करें हैं, कांच की दीवार वाले घर जिन्हों के, वो ही पत्थर रात-दिन फेंका करें हैं, दाग़ दामन में छुपाये डोलते हैं , दूसरों के गम पे जो थूका करें हैं, खोल कर हैं दिल करें छींटाकशी जो, वो ही अपनी बेर को रोका करें हैं  उर्मिला माधव... 17.1.2014...

बोझ कब हल्का हुआ है

जिस्म का ये बोझ कब हल्का हुआ है, जिल्द बनकर रूह से लिपटा हुआ है.. आईना सच बोलता है फितरतन ही, बेसबब ही हर जगह रुसवा हुआ है.. दश्त से गुज़रे तो ख़ुद को छोड़ आए, ज़ेह्न है के आज तक अटका हुआ है.. इब्तिदा है क्या अभी से सोच लें हम, रोज़े अव्वल एक ही सजदा हुआ है.. किस तरह जुग्राफ़िया चेहरे का देखें, आईना हर सम्त से चटका हुआ है.. दिल तरसता है सुकूं के वास्ते अब, जो भी है सब आज तक बिखरा हुआ है.. उर्मिला माधव
तुम्हारा क्या है तुम्हें सुर्ख़ियों में रहना है, हमारा क्या है हमें सूफ़ियों में रहना है ..

आदमी की ज़ात

मुरदार जब से आदमी की ज़ात हो गई, कुल जिंदगी ही अहले ख़राबात हो गई, हमने जो एक तिफ़्ल को गोदी में क्या लिया, उसकी हंसी तो रंग-ए-तिलिस्मात हो गई, हम दर-ब-दर भटकते रहे जीस्त को लिए लो यक-ब-यक ही उससे मुलाक़ात हो गई, बेहतर यही था,ऐब भी हम ख़ुद के देखते, अपनी खता थी,हासिले सदमात हो गई, बस सोचते ही रह गए,हर बात भूल कर, किसको ख़याल था के ,कहाँ रात हो गई, उठते थे,बैठते थे,नए देख कर अज़ाब, किस-किससे जाके कहते,कोई बात हो गई, तन्हाइयों में बैठ कर रोये भी इस क़दर, लगता था जैसे बे-अदब बरसात हो गई कोशिश तो ये रही के हंसें उम्र भर को हम, पर आंसुओं की समझो हवालात होगई.... #उर्मिलामाधव... 14.1.2016

कुछ न था

हाथ ऊपर को बढ़ाया बस हवा थी कुछ न था, सर उठाया और देखा बस हया थी कुछ न था दिल के सारे वलवलों का आह में दम घुट गया, दर्द की उन आंधियों में बस सदा थी कुछ न था, एक झोंका सा हवा का जिस्म को छू कर गया  इक उफ़क था तीरगी थी बस घटा थी कुछ न था, उर्मिला माधव 

नज़्म बहुत देखा जहां जाना

बहुत देखा जहां जाना ,कभी मेरी गली आना, दर-ओ-दीवार गलियों के,बहुत सीलन भरे होंगे, और हाँ वो तीरगी के साए में, डरकर छुपे होंगे, जो बर्ग-ए-गुल मुख़ातिब हो,तो आंसू देखना उसके, बदन में आबले होंगे ,महज़ ग़म पूछना उसके, ये मेरी ज़िंदगी जो अब तलक पुर ख़ार ज़िन्दां है, मेरे ग़म से मेरे रब की भी दुनियां,ख़ास वीरां है, चमन वीरां,सहन वीरां,लगे रूह-ओ-ज़ेहन वीरां, बहे आँखों से जो दरिया लगे गंग-ओ-जमन वीरां, यहाँ आब-ओ-हवा शम्स-ओ-क़मर को दूर रखती है, मसर्रत के जहां में ख़ास कर माज़ूर रखती है , के ज़ेरे आसमां लो रात भर तुम भी गुज़ारो तो, बड़ी शिद्दत से हिम्मत से सितारों को पुकारो तो, अगर आवाज़ ख़ाली लौट कर आये तो बतलाना, हुआ महसूस कैसा इस तरह,बेकार चिल्लाना, कभी मेरी गली आना..... #उर्मिलामाधव...

बरपा किया है शोर सा

बरपा किया है शोर सा, इतना जहान में, समझे नहीं कि हम हैं यहां किस मकान में, दरया की ख़ुश्कियों ने दिखा दी है बानगी, जब क़श्तियाँ भी उड़ने लगीं आसमान में, हर कोई गिर रहा है,ज़मीं खींचती सी है,  इस पर कमी कहां है किसी इत्मिनान में, हमको गुमां नहीं है किसी आसमान का, हम मोतबर कहाँ हैं किसी इम्तिहान में, उर्मिला माधव  13.1.2019

मर गए सब

अपने-अपने दायरों में मर गए सब, दूसरा कोई आगया तो डर गए सब, सहर होते ही मिले एक दूसरे से, शाम होते अपने-अपने घर गए सब, मुश्किलों के वक़्त सब दरकार थे, कोई भी जाना न चाहे,पर गए सब, उर्मिला माधव.. 13.1.2017

मेरे हिस्से के अश्क तुम पी लो

मेरे हिस्से के अश्क़ तुम पी लो, और ये ज़िन्दगी भी तुम जी लो.... लोग जब तबसरा करें तुम पर, उससे पहले ही होठ तुम सीं लो   मुझको तमगा मिला रक़ाबत का, ये भी इलज़ाम सर पे तुम.ही लो, रब ने ये सादगी जो बख्शी.है, लो चलो ऐसे ज़ख्म तुम भी लो, उर्मिला माधव.... 12.1.2017...

मुहब्बत में बराबर

मुहब्बत में बराबर का तमाशा ठीक रहता है, ज़रा बतलाइए क्या तोला माशा ठीक रहता है?

एक पैरोडी

एक पैरोडी शायर से माजरत के साथ🙏😊 ख़मोश लब हैं खुली हैं पलकें अभी ये नफ़रत नई–नई है, अभी तक़ल्लुफ़ है दुश्मनी में, अभी अदावत नई–नई है.. जो खानदानी लफंगे हैं वो मिज़ाज रखते हैं गर्म अपना, तुम्हारा लहजा बता रहा है अभी बग़ावत नई–नई है  🙏🙏

चांद सा चेहरा

वो जो चांद सा चेहरा है सितारों से घिरा है, कहते भी नहीं बनता कि ये चांद मिरा है, कहने को बहुत कुछ है मगर कैसे बताऊं, शुरुआत की खातिर भी नहीं कोई सिरा है, उर्मिला माधव 

मर नहीं जाते

जो लोग मुंतज़िर हैं कभी घर नहीं जाते, रस्तों को फ़क़त देखते हैं मर नहीं जाते,

चिलमन दरूं गिरा के

चिलमन दरूं गिरा के किया आपने गुनाह, इस बे-अदब अदा का भला क्या करेंगे आह !!, इन फासलों के साथ ही चलना है गर हमें, किसकी करेंगे आरज़ू,किसकी तकेंगे राह, करने से पहले आपने सोचा तो होगा खूब, हरक़त को आफरीं है,अदावत की वाह-वाह !! इसके हुए मआनी के उल्फत हुयी तमाम, अब देखनी है आपकी बदली हुयी निगाह, हमको किया अमीर भी इफरात से जनाब, रख्खेंगे अब सहेज के ये आह और कराह,  उर्मिला माधव...

बीमार कर गए

उफ़ ज़िन्दगी के मरहले बीमार कर गए, ऐसा लगा कि ग़म का परस्तार कर गए दामन में सिर्फ खार हैं.....पैरों में आबले, रस्ता बहुत कठिन था मगर पार कर गए, कुछ आरज़ू थी...कुछ थे इरादे बहुत बड़े, कुछ रास्ते के गम मुझे खुद्दार कर गए, सब लोग क्या कहेंगे......यही डर बहुत रहा, क्या-क्या सुनेंगे हम जो अगर हार कर गए, किसको अज़ीज़ होगी कहो ये अज़ल की राह, हम से ही सिर फिरे हैं...जिगर वार कर गए ...  उर्मिला माधव ... १४.९.२०१३

अब कोई मंज़र पसे मंज़र नहीं

अब कोई मंज़र पसे मंज़र नहीं, हम फ़क़ीरों का कोई भी घर नहीं, जो मुक़द्दर में लिखा मिल जायगा, बे-सबब हम घूमते दर -दर नहीं, हम जमा करते नहीं है कौड़ियाँ, इक क़फ़न ही चाहिए,बिस्तर नहीं, कर रहे आपस में सब पंजःकशी, ये मिरा है,वो तिरा पत्थर नहीं, इसको अपनी क़ब्र में लगवाएंगे, इससे बढ़कर और कुछ बदतर नहीं, उर्मिला माधव

बहुत देखा जहां जाना

बहुत देखा जहां जाना ,कभी मेरी गली आना, दर-ओ-दीवार गलियों के,बहुत सीलन भरे होंगे, और हाँ वो तीरगी के साए में, डरकर छुपे होंगे, जो बर्ग-ए-गुल मुख़ातिब हो,तो आंसू देखना उसके, बदन में आबले होंगे ,महज़ ग़म पूछना उसके, ये मेरी ज़िंदगी जो अब तलक पुर ख़ार ज़िन्दां है, मेरे ग़म से मेरे रब की भी दुनियां,ख़ास वीरां है, चमन वीरां,सहन वीरां,लगे रूह-ओ-ज़ेहन वीरां, बहे आँखों से जो दरिया लगे गंग-ओ-जमन वीरां, यहाँ आब-ओ-हवा शम्स-ओ-क़मर को दूर रखती है, मसर्रत के जहां में ख़ास कर माज़ूर रखती है , के ज़ेरे आसमां लो रात भर तुम भी गुज़ारो तो, बड़ी शिद्दत से हिम्मत से सितारों को पुकारो तो, अगर आवाज़ ख़ाली लौट कर आये तो बतलाना, हुआ महसूस कैसा इस तरह,बेकार चिल्लाना, कभी मेरी गली आना..... #उर्मिलामाधव... 9.1.2016

सर को रक्खा गया दोष पर

सर तो ये रख्खा गया है दोष पर, किस लिए छीना गया है होश पर, क्या लगाया इसके भीतर राम जी, जाने क्या-क्या सोचता है जोश पर, दायरों की करके कुल मट्टी पलीद, ज़िक्र भी छेड़ा गया मयनोश पर, उर्मिला माधव

हक़ अदा करदो

तुम तो बस इतना हक़ अदा करदो, दामन-ए-दिल को ग़मज़दा कर दो, देर किस बात की है अब इस में, जितनी जल्दी हो,इब्तदा कर दो.. उर्मिला माधव

ग़म बहुत है संभलता नहीं है

ग़म बहुत है संभलता नहीं है, बोझ ये मुझसे चलता नहीं है, क्यूँ है ये शहर ख़ामोश इतना, क्या ये सन्नाटा खलता नहीं है, बेसबब कोई शायद यहाँ पर, घर से बाहर निकलता नहीं है, कितनी मुश्किल हैं ये मुश्किलें भी, मेरा दिल क्यूँ बहलता नहीं है ? अपने दामन का साया ही देदो, दिन में सूरज पिघलता नहीं है.... उर्मिला माधव.. 9.1.2017

ताज़ीराते हिंद की तस्वीर देखिए

अब ताज़िराते हिन्द की तस्वीर देखिये,  हर ज़ाविये से मिट रही तक़दीर देखिये.. कुछ ठीकरों में बेचता इंसान अपने ख़ाब, चलती कहाँ है कोई भी तदबीर देखिये.. उफ़ गर्द में निहां है यहाँ आदमी की ज़ात,  हर पाँव अब हुआ है यूँ ज़ंजीर देखिये.. रहजन हों सलातीन तो बुनियाद भी है ख़ाक लुटती हुई वतन की ये जागीर देखिये.. औक़ात अब बशर की कहाँ कोई है जनाब ,  कुछ शोहदों के हाथ में शमशीर देखिये...  उर्मिला माधव....

मुर्दार तो तू भी नहीं

Main agar mazboot hoon murdaar to tu bhi nahin, Raasta roke mera wo haar to too bhi nahin, Barq aaii thi kabhi girne, dabishtaaN ki taraf, Maine hans ke kah diya, gulzaar to tu bhi nahin, Khud ba khud to jal rahi hai,tu sarapa aag hai, Ghar jala kar hans saki,har baar to tu bhi nahin, Muddaton se jal rahe hain ham to sehra ki tarah, Par samandar saA kahin kirdar to tu bhi nahin BewafaiI ka abas,ilzaam kyun mere taiiN, Saahib-e-kirdaar saa gham khwaar to tu bhi nahin, ZindagI ko jaa-b-jaa ruswa kare hai kisliye, Sach yahi hai ke bahut , bezaar to tu bhi nahin.... #उर्मिलामाधव Urmila Madhav.. #urdupoetry

मुंह ज़रा मोड़ कर देखिए

मुंह ज़रा मोड़ कर देखिये, आप ज़िद छोड़ कर देखिये, आप मुझसे बुरे भी हैं क्या ? आइये होड़ कर देखिये, अपनी टूटी हुई ज़िन्दगी, फिर ज़रा जोड़ कर देखिये, आप गर ख़ुद पे भारी हुए, कुछ अना तोड़ कर देखिये... कारसाज़ी है चौखट में क्या, ये तो सर फोड़ कर देखिये, उर्मिला माधव,

आईना देखो

तुम कभी आईना अगर देखो, अपनी आंखों को इक नज़र देखो, मेरा दावा है मर मिटोगे तुम, जब भी देखो तो इस क़दर देखो, मैंने इनमें नशा ही देखा है, दिल में उठता है इक क़हर देखो.. तुम मेरी बात क्यों नहीं सुनते, मेरी जानिब से बस इधर देखो.. उर्मिला माधव

तू मेरी आख़री मुहब्बत है

तू मेरी आख़री मुहब्बत है, ज़िन्दगी तू है,तू इबादत है, रु ब रु रह मिरी निगाहों के, तुझको छू लूँ अज़ीम शिद्दत है, मेरी ख्वाहिश हैं,तेरे रूह-ओ-जिगर, कब तेरा जिस्म मेरी चाहत है ? मुझपे क़ाबिज़ है तेरी हुस्न-ए-नज़र, तुझको देखूं ये मेरी आदत है, तू कभी छुप भी जाए है, मुझ से, तेरी ये ख़ास एक शरारत है, तुझको देखे जो ग़ैर नज़्र कोई, फिर तो उस शख़्स से बगावत है.. उर्मिला माधव,

छोड़ा जो एक घर

छोड़ा जो एक घर तो वहीं चार घर खुले, खुल भी रहे थे कोई तो बीमार घर खुले, हमको अज़ीज़ वो ही था जो दूर हमसे था, हम चाहते थे उसका ही हर बार घर खुले.. उर्मिला माधव

उदास लगता है

ख़ामख्वाह दिल उदास लगता है, जिस्म ग़म का लिबास लगता है  ये जहां भी अजीब उलझन है, कब कोई ग़म शनास लगता है, अपना आपा संभल सका जो कभी, बस वही वक़्त ख़ास लगता है, उर्मिला माधव 

लोग सब

लोग सब वाह-वाह करते रहे, हम हज़ारों गुनाह करते रहे, जैसे भी हो सका जहां भर में, इक मुहब्बत की चाह करते रहे, मरने वालों को सब ने मरने दिया, अपने जीने की राह करते रहे, रोने-धोने से क्या गुज़र होती, जीस्त को ख़्वाब गाह करते रहे, सच्ची खुशियां कहाँ मयस्सर थीं, झूठे ग़म से निबाह करते रहे,   अपना जलवा बुलंद करने को, ख़ुद से ख़ुद ही सलाह करते रहे, तेरी दुनियां के सारे तुर्रम खां, देख कर,आह-आह करते रहे, उर्मिला माधव 

सिर्फ़ मजबूती रखी हर गाम पे

हमने अपनी ज़िन्दगी के नाम पे, सिर्फ़ मज़बूती रखी हर गाम पे, दिल को जब तबियत हुई तो हंस लिया, सोचना क्या इसमें सुब्हो शाम पे, राब्ते तोड़े नहीं हमने बख़ुद, टूट गए तो रोये कब अंजाम पे, एक मुश्किल वक़्त था सो कट गया, जब अकेले ही खड़े थे बाम पे, रफ्तनी के वक़्त देखा जाएगा, आह क्या भरना किसी इल्हाम पे... उर्मिला माधव.. 6.1.2016

वक़्त के हम भी

वक़्त के हम भी क़र्ज़दार हुए, मरहले गम के दरकिनार हुए, दिल को ताक़त कहाँ धड़कने की, शुक्र है दोस्त.......ग़मगुसार हुए, ज़िन्दगी सुब्ह -ओ-शाम ढलती है, सब मगर इसके......परस्तार हुए, यूँ तो थकते क़दम भी रुकते रहे, चढ़ते दरिया के फिर भी पार हुए, सिर्फ़ शिद्दत....मुफ़ीद होती है, हौसले गर......ब-इख्तियार हुए.... उर्मिला माधव 

चार दिन की चांदनी है

चार दिन की जिंदगानी....इसलिए हँसते हैं हम, लोग कहते हैं भंवर में...किसलिए फंसते हैं हम, अब न हमको चाहिए,दर्द-ए-मुहब्बत रंज-ओ-गम,  इसलिए कोई कमाँ दिल पर......नहीं कसते हैं हम, जगमगाती बस्तियां और ये चमकते जिस्म-ओ-जाँ,  गम की इन परछाईयों से.........दूर ही बसते हैं हम उर्मिला माधव