वक़्त के हम भी
वक़्त के हम भी क़र्ज़दार हुए,
मरहले गम के दरकिनार हुए,
दिल को ताक़त कहाँ धड़कने की,
शुक्र है दोस्त.......ग़मगुसार हुए,
ज़िन्दगी सुब्ह -ओ-शाम ढलती है,
सब मगर इसके......परस्तार हुए,
यूँ तो थकते क़दम भी रुकते रहे,
चढ़ते दरिया के फिर भी पार हुए,
सिर्फ़ शिद्दत....मुफ़ीद होती है,
हौसले गर......ब-इख्तियार हुए....
उर्मिला माधव
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