चार दिन की चांदनी है

चार दिन की जिंदगानी....इसलिए हँसते हैं हम,
लोग कहते हैं भंवर में...किसलिए फंसते हैं हम,

अब न हमको चाहिए,दर्द-ए-मुहब्बत रंज-ओ-गम, 
इसलिए कोई कमाँ दिल पर......नहीं कसते हैं हम,

जगमगाती बस्तियां और ये चमकते जिस्म-ओ-जाँ, 
गम की इन परछाईयों से.........दूर ही बसते हैं हम
उर्मिला माधव 

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