गराँ दिल पे गुज़रा है,गुज़रा ज़माना, यूँ रेगे तपाँ में ........रहा आशियाना, हवाओं ने की उम्र भर ही ख़िलाफ़त, हुआ नेस्तोनाबूद ....अपना ठिकाना, हरे ज़ख़्म लेकर ..हुए दर-ब-दर के, शुरू कर दिया सबने..दामन बचाना, जो जज़्बात जम के हुए पत्थरों से, तो दफ़ना दिया हमने हंसना-हँसाना, जहां भर ने हमसे बहुत दिल्लगी की, कड़ा एक भी हमने फ़िकरा कहा ना, अजब कश्मकश से गुज़रते थे,फिर भी, न कुछ ज़िन्दगी से .......बनाया बहाना, नवाज़े गये .....सिर्फ़ तंज़-ओ-तबर से, बहुत सब्र अपना.......पड़ा आज़माना, बहुत चाहते हैं न सोचें हम इस पर, मगर दिल न भूले वो नज़रें चुराना, फ़क़त सच्ची ज़िद के,बहुत हम धनी थे, जो दिल ने न चाहा......न माना,न माना.... उर्मिला माधव, 11.7.2016
तुम हमारी मुश्किलों के साथ कब चल पाओगे, साफ़ कहते हैं के आधी राह पर रुक जाओगे, कौन आख़िर चाहता है,उम्र भर जलता रहे, गर तड़पते देख लोगे,तुम बहुत घबराओगे, ज़ख़्म मत छेड़ो गुज़ारिश कर रहे हैं ऐ मियां, ज़िद अगर कर जाओगे तो बाद में पछताओगे, इक ज़माना हो गया,हम इश्क़ लिखते ही नहीं, हम अगर लिख्खेंगे तुम ही दस तरह बल खाओगे हम भी तो हर चंद ख़ुद को रोकते रहते हैं बस, फिर भी ना माने तो ठंडी आग में जल जाओगे, उर्मिला माधव, 2.11.2017
मंसूब है मेरी अपनी ज़िन्दग़ी मेरी नज़र में ख़ूब है, इसलिए हर रंग मेरा ..मुझसे ही मंसूब है, आँख में काजल नहीं ऑ मांग में सुर्ख़ी नहीं, पर मुहब्बत का मुझे मालूम हर उस्लूब है , ये हकीक़त है के उसने आज पर्दा कर लिया, फिर भी मेरी ज़िन्दगी में एक वही महबूब है, जाने कितनी बाज़ियां जीती हैं मैंने उम्र भर तुमने कैसे कह दिया के दिल मेरा मग्लूब है मैं नमाज़ी हूँ मुझे हासिल हैं रब की नेमतें, लोग कहते हैं मिरा अंदाज़ ही मज्जूब है, उर्मिला माधव.... 5 .8 .2017 .. उस्लूब--- रीति मग्लूब---पराजित मज्जूब--- वो संत जो देखने वालों के लिए बावला हो
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