आदमी की ज़ात

मुरदार जब से आदमी की ज़ात हो गई,
कुल जिंदगी ही अहले ख़राबात हो गई,

हमने जो एक तिफ़्ल को गोदी में क्या लिया,
उसकी हंसी तो रंग-ए-तिलिस्मात हो गई,

हम दर-ब-दर भटकते रहे जीस्त को लिए
लो यक-ब-यक ही उससे मुलाक़ात हो गई,

बेहतर यही था,ऐब भी हम ख़ुद के देखते,
अपनी खता थी,हासिले सदमात हो गई,

बस सोचते ही रह गए,हर बात भूल कर,
किसको ख़याल था के ,कहाँ रात हो गई,

उठते थे,बैठते थे,नए देख कर अज़ाब,
किस-किससे जाके कहते,कोई बात हो गई,

तन्हाइयों में बैठ कर रोये भी इस क़दर,
लगता था जैसे बे-अदब बरसात हो गई

कोशिश तो ये रही के हंसें उम्र भर को हम,
पर आंसुओं की समझो हवालात होगई....
#उर्मिलामाधव...
14.1.2016

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