अब कोई मंज़र पसे मंज़र नहीं
अब कोई मंज़र पसे मंज़र नहीं,
हम फ़क़ीरों का कोई भी घर नहीं,
जो मुक़द्दर में लिखा मिल जायगा,
बे-सबब हम घूमते दर -दर नहीं,
हम जमा करते नहीं है कौड़ियाँ,
इक क़फ़न ही चाहिए,बिस्तर नहीं,
कर रहे आपस में सब पंजःकशी,
ये मिरा है,वो तिरा पत्थर नहीं,
इसको अपनी क़ब्र में लगवाएंगे,
इससे बढ़कर और कुछ बदतर नहीं,
उर्मिला माधव
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