कुछ न था
हाथ ऊपर को बढ़ाया बस हवा थी कुछ न था,
सर उठाया और देखा बस हया थी कुछ न था
दिल के सारे वलवलों का आह में दम घुट गया,
दर्द की उन आंधियों में बस सदा थी कुछ न था,
एक झोंका सा हवा का जिस्म को छू कर गया
इक उफ़क था तीरगी थी बस घटा थी कुछ न था,
उर्मिला माधव
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