बोझ कब हल्का हुआ है
जिस्म का ये बोझ कब हल्का हुआ है,
जिल्द बनकर रूह से लिपटा हुआ है..
आईना सच बोलता है फितरतन ही,
बेसबब ही हर जगह रुसवा हुआ है..
दश्त से गुज़रे तो ख़ुद को छोड़ आए,
ज़ेह्न है के आज तक अटका हुआ है..
इब्तिदा है क्या अभी से सोच लें हम,
रोज़े अव्वल एक ही सजदा हुआ है..
किस तरह जुग्राफ़िया चेहरे का देखें,
आईना हर सम्त से चटका हुआ है..
दिल तरसता है सुकूं के वास्ते अब,
जो भी है सब आज तक बिखरा हुआ है..
उर्मिला माधव
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