ग़म बहुत है संभलता नहीं है

ग़म बहुत है संभलता नहीं है,
बोझ ये मुझसे चलता नहीं है,

क्यूँ है ये शहर ख़ामोश इतना,
क्या ये सन्नाटा खलता नहीं है,

बेसबब कोई शायद यहाँ पर,
घर से बाहर निकलता नहीं है,

कितनी मुश्किल हैं ये मुश्किलें भी,
मेरा दिल क्यूँ बहलता नहीं है ?

अपने दामन का साया ही देदो,
दिन में सूरज पिघलता नहीं है....
उर्मिला माधव..
9.1.2017

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