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Showing posts from December, 2025

इस जहां के लोग अब

इस जहां के लोग अब कितने सयाने हो गए, साल बेशक हो नया पर हम पुराने हो गए  रौशनी बारूद की है,चार सू रंग-ए-क़फ़न, आदमी की ज़िन्दगी में कितने ख़ाने हो गए,  इक बिखर जाता है,खींचें,ग़र सिरा हम दूसरा,  क्या कहें दामन में अब इतने दहाने हो गए, होगये खामोश,दुनियां के नज़ारे देख कर, लोग ये समझा किये के हम दिवाने हो गए, हमने जब दस्तार रख दी,मंज़िलों के छोर पे, बस फ़लक़ के साए में,अपने ठिकाने हो गए, हम अज़ल से ही रहे बस,इन्तेहाई सादा दिल, दह्र की अय आंधियो ,हम क्यूँ निशाने होगये?  #उर्मिलामाधव...

तस्वीर तो हटा दी

तस्वीर तो हटा दी अब कील रह गई है, आंखों में अब हमारी इक झील रह गई है, ये दिल है अब हमारा इक क़ब्र गाह जैसे  सब कुछ नहीं उजागर तफ़सील रह गई है, जब तुमको देखना ही आंखों की रौशनी थी, अब रौशनी नदारद कंदील रह गई है, जब तक हवा चलेगी तब तक चलेंगे हम भी, बस मरहलों की दूरी कुछ मील रह गई है. कैसे खुरच के इसको हम दूर कर सकेंगे,  जो तुमने छाप दी थी वो सील रह गई है.. उर्मिला माधव

मैं वो पत्थर हूं

मैं वो पथ्थर हूँ जिसे तुम तोड़ तो सकते नहीं, और फिर आदत भी अपनी छोड़ तो सकते नहीं, आओ फिर इस आग में तुम डूब जाना सीख लो, खौलते दरिया का रुख़ तुम, मोड़ तो सकते नहीं, तपते सहरा में दहकती रेत का अहसास है, ये वो दुनियां है जहां सर फोड़ तो सकते नहीं कुछ हुनर तो हाथ में हैं सिर्फ़ उस करतार के, तोड़ने वाले भी, दिल को जोड़ तो सकते नहीं, उर्मिला माधव

हैरान कर दिया

तुमने हमें अचानक अनजान कर दिया, समझो हमारे ग़म का सामान कर दिया.. ऐसा भी तुम करोगे उम्मीद ही नहीं थी, बेजा क़दम उठा कर हैरान कर दिया, जो तुमने कर दिया है तुमको रहे मुबारक, बस यक़बयक़ हमें ही मेहमान कर दिया.. हम उनसे  कुछ खफ़ा थे समझे नहीं वो हमको  हद है ज़रा सी बात का तूफ़ान कर दिया उर्मिला माधव 

क़िस्सा सुना रहे हैं

क़िस्सा सुना रहे हैं ये वक़्त-ए-शाम किसका, इस गुफ़्तगू में आख़िर उट्ठा है नाम किसका, नामा निगार बनके आया है आज क़ासिद, लाया है देखो ख़त में,किसको सलाम किसका, नीलाम हो रहे हैं जज़्बात हर किसी के बाज़ार में लगाया कब किसने दाम किसका? फ़िरकःपरस्त आक़ा क्या फैसला करेंगे, किस-किस तरह से होगा,जीना हराम किसका? हम जी रहे हैं अब तक ज़िंदादिली के दम पर, करना है जब सभी ख़ुद, फिर एहतराम किसका? उर्मिला माधव.. 30.8.2016

जब हुस्न का आलम था (नज़्म)

जब हुस्न का आलम था,ज़ुल्फ़ों में पेच-ओ-ख़म था, दिल कूचा-ए- जानम था,सर पे न कोई ग़म था, क़दमों तले जहाँ था,बाँहों में आसमां था, परवाज़ बे-अलम थी,मेरे साथ एक सनम था, क्या दास्ताँ सुनाऊँ,आँधी सी एक आई, सब लेगई उड़ाके,तक़दीर का क़रम था, जब होश हमको आया,बस एक ही मंज़र था, सब लेगया बहाके मेरे साथ जो सनम था ।।  उर्मिला माधव..

तो भजन कर लिया

मन हुआ अनमना तो,भजन कर लिया, लेके गंगा का जल आचमन कर लिया, बैठे आसन पे भी पालथी मार कर, जग के हर देवता को नमन कर लिया, जाने कितनी तरह से किया कीर्तन, अपने हाथों से पूरा जतन कर लिया, क्यों ये संसार है सोच कर थक गए, और चिंता को कितना गहन कर लिया, म्रत्यु पर्यंत दूंढा किये सार हम , अंत में मृत्यु का ही वरन कर लिया... उर्मिला माधव... २७.१२.२०१३.

तुम ही तुम चलते रहे

साथ मेरे तुम ही तुम चलते रहे, ख़ाब बन कर आँख में पलते रहे, नींद में झपकाईं पलकें जो कभी, हाँ ये सच है,आँख तुम मलते रहे, कितनी हैरत है रहे तुम बे-वफ़ा !! और अदू के साथ भी चलते रहे! क्या सुकूं पाया जला कर आग में, ख़ुद भी अपनी आग में जलते रहे, ग़र समझते हो अगर खुर्शीद हो, शाम को अंजाम है.....ढलते रहे, उर्मिला माधव...

बाहम है सो नहीं सकते

जुनून-ए-ख़ाब भी बाहम है सो नहीं सकते सरापा नींद सा आलम है सो नहीं सकते, हमारी आंख में पानी सा रुक रहा है कहीं, ज़माना आज भी बरहम है, सो नहीं सकते, ये बात है के अभी,अधमरे पड़े हैं कहीं, हमारे जिस्म का मातम है,सो नहीं सकते, हमारे कान में इक नज़्म गूंजती है अभी, बड़ी अजीब सी सरगम है सो नहीं सकते, उर्मिला माधव

उसी जुस्तजू में

उसी जुस्तजू में जिए जा रहे हैं, जो कह कर गए थे कि ले जा रहे हैं, हमीं ने तो इज्ज़त भी बख्शी थी उनको, वही वार हम पर किये जा रहे हैं, कभी कितने ख़ुश थे,मगर आज बोले, ज़ह्र ज़ीस्त है और पिए जा रहे हैं, वो ज़ह्र-ए-ज़ुबां उनका अब तक है तारी, के हम ज़ख्म अपने सिंये जा रहे हैं, अजब हाल है उनके गुलशन का देखो, हवा में भी पत्थर, दिए जा रहे हैं.... उर्मिला माधव 

तज़किरा हम क्या करें

दुश्मनी का तज़किरा हम क्या करें, बढ़ चुका ये मसअला, कम क्या करें, जो हुआ है वो ही तो होना था बस, इसके ऊपर अब भला ग़म क्या करें, गम की दुनियां ऑ ये रंग-ए-मौसिक़ी, उड़ना है तो हौसला कम क्या करें, उर्मिला माधव 

हम थक गए

हम थक गए,  आप नही समझे, हम और थक गए, आप फिर भी नहीं समझे, कितने थके हुए लेकिन स्तब्ध, कैसे धीरे-धीरे सब कुछ छूट जाता, पापा अम्मा,फिर साँईं, और फिर आख़री टूटन, दुनिया, फिर कोई और हिसाब रखेगा, कम अज़ कम  हम तो नहीं... उर्मिला माधव

वबाल करके

खड़े हैं मुश्किल में आज हम भी किसी से कोई सवाल करके  जो बात हमने बड़ी कही थी वो देखी सबने ज़वाल करके,

मैं जिस्म जीती रही

मैं जिस्म जीती रहा, ज़िन्दगी रही बिखरी, अजीब ज़िद थी, किसी तौर भी नहीं सुधरी, हम उम्र भर जिसे खोके हवास, रोया किये, वो चीज़ क्या थी, कभी ज़ेह्न से नहीं उतरी, उर्मिला माधव

आह को आह भी नहीं कहते

आह को आह भी नहीं कहते, इश्क़ को ज़िन्दगी नहीं कहते, दिल को महदूद रखना अच्छा है ग़ैर से ग़म कभी नहीं कहते, गुफ़्तगू में हज़ार ख़म निकलें, उसको हम सादगी नहीं कहते, गर चे है फ़िक़्र दीनो दुनियां की, उसको आवारगी नहीं कहते, अपनी तबियत में जो फ़क़ीरी है, इसको बेचारगी नहीं कहते, फ़र्क़ समझे जो रेत पानी का, उसको हम तिशनगी नहीं कहते, उर्मिला माधव

हम भी करके देखते हैं

फिर से हिफ़्ज़े आबरू अब हम भी करके देखते हैं, ख़ुद के ही खूं से वज़ू अब हम भी करके देखते हैं, आदमी का क़द गिरा तो कितना छोटा हो गया, फ़िर से इसको ख़ूबरु अब हम भी करके देखते हैं, सोचते हैं अपने दिल का ढूंढ लें कोई बदल, इक ज़रा सी जुस्तजू अब हम भी करके देखते हैं, लोग कहते हैं यहां पर इश्क़ करना है सवाब, दिल बुरीदह सुर्ख़रू अब हम भी करके देखते हैं, उर्मिला माधव

जा तुझे अय ज़िंदगी

जा तुझे अय ज़िन्दगी अब हर नफ़स ठुकरा दिया, अपने हाथों हमने अपने वक़्त को चलता किया, हर क़दम पर आबलों के नाम लिख्खे हैं अभी, ज़ेह्न से एक आह निकली उसमें सब दफना दिया, ख़ुद तमाशा कर दिया,लो हमने अपनी मौत को कुछ दयानतदार आये,रूह को क़फ़ना दिया, जिस शनासाई का दावा हर क़दम करते थे हम, उन मोअज़्ज़िज़ दोस्तों ने,दोस्त को रुसवा किया... उर्मिला माधव 

हम लोगों से बात

हम लोगों से बात नहीं कर पाते हैं, बेमतलब ख़िदमात नहीं कर पाते हैं, सब दुनियां मग़रूर समझती रहती है, ज़ाया हम जज़्बात नहीं कर पाते हैं, भीतर भीतर ज़ख़्म उबलते रहते हैं, गिरया को बरसात नहीं कर पाते हैं, जब कोई तूफ़ान उठाया इस दिल ने, हम आंखों में रात नहीं कर पाते हैं, जब पहले ही बोझ बहुत सा है सर पर, उलझन को इफ़रात नहीं कर पाते हैं... उर्मिला माधव

दश्त जब हो ही गया मेरा कलेजा

दश्त जब हो ही गया मेरा कलेजा क्या करूँ, वहशतें या हसरतें जो भी हैं लेजा, क्या करूँ , दिल हथेली पै रखा और साथ में इक ख़त दिया, कुछ नहीं बाकी बचा है क्यों ये भेजा, क्या करूँ, हर घड़ी हलकान रहना और न सोना रात भर, और जो तनहाई दी थी,वो भी है जा, क्या करूँ, कब तलक चल पाएगी ये एक तरफ़ा ज़्यादती, मैं भी जानूँ हूँ तग़ाफ़ुल जा कहे जा, क्या करूँ, मुझको सुनना ही नहीं है,तल्ख़ियों का फ़लसफ़ा, उम्र भर तो मैंने तनहा ,ग़म सहेजा, क्या करूँ #उर्मिलामाधव... 15.12.2014..

अदब

अदब अब सभी के दफ़ा हो गए हैं, बुज़ुर्गाने आला ख़फा हो गए है समेटे नहीं जा सके दिल के टुकड़े, ये हिस्से भी कितनी दफ़ा हो गए हैं, सिखाई मुहब्बत-ऑ-तहज़ीब जिनको, जवां क्या हुए, बे-वफ़ा हो गए हैं, मुहब्बत के मानी बचे ही कहाँ कुछ, फ़क़त अब ज़ियाँ और नफ़ा हो गए हैं, वो सर को झुकाना ऑ तस्लीम कहना, किताबों का बस फ़लसफ़ा होगये हैं, उर्मिला माधव...

हम नहीं समझे

अभी तक हम नहीं समझे तुम्हें किससे मुहब्बत है, कि या फिर जो भी ज़ाहिर है महज़ कोरी शरारत है? कभी रो के कभी हंस के, कभी डर के मिले हो तुम, हमेशा क्यूं ये लगता है तुम्हें नख़रों की आदत है... हमें इक लफ़्ज़ ही लगता रहा हर पल मुनव्वर सा, सुना तुमने भी तो होगा, जो कहलाता इबादत है.. उर्मिला माधव
मेरी ज़िन्दगानी का तर्जुमा न हुआ न कोई समझ सका, जाने क्या बला थी वो ज़िंदगी जोकि हादिसों में गुज़र गई..

तुमने क्या किया

तुमको पसंद हमने किया तुमने क्या किया?? दिल को बुलंद हमने किया तुमने क्या किया?? तनहाइयों में रोया किये.......ज़ार-ज़ार खूब, दिल दर्द मंद हमने किया तुमने क्या किया?? तुमने तवज्जो हम पे किसी तौर जब न की, दिल दस्त-बंद हमने किया तुमने क्या किया ?? उर्मिला माधव ... १५.९.२०१३

जले जाते हैं हम

आपके ग़म में जले जाते हैं हम, आपसे मिलने चले जाते हैं हम, उम्र भर सारे तमाशे देखकर भी, झूठ बातों से छले जाते हैं हम, सांस आती है हमेशा आज जैसी, इस क़दर ग़म में गले जाते हैं हम, सब्र का दामन संभाला उम्र भर ही, अब इधर आ कर ढले जाते हैं हम,

ज़ख़्म सीना

ज़ख़्म सींना मेरा नसीब है क्या ? तेरी दुनियां कोई सलीब है क्या? मेरी आवाज़ जब लरजती है पूछते हैं कोई अदीब है क्या? सांस क्यों ज़िन्दगी पे भारी है, ज़िन्दगी मौत के क़रीब है क्या? तूने तक़लीफ़ इतनी क्यों दी है, तू गए वक़्त का रक़ीब है क्या ? एक हवा तक इधर नहीं आती, ये बता रब बहुत ग़रीब है क्या ? उर्मिला माधव..

सोते हैं हम बहुत

जब दर्द से मुक़ाबिल होते हैं हम बहुत, सब लोग सोचते हैं,रोते हैं हम बहुत, अपना चलन हमेशा कुछ ख़ास ही रहा है, महफ़िल के बीच हंसकर,खोते हैं हम बहुत, साँसें जो मिल गई हैं,पूरी तो करनी होंगी यूँ ही बार ज़िन्दगी का ढोते हैं हम बहुत खुशियाँ गईं हमेशा ज़ख़्मों का रंग देकर, ऐसे ही दाग़ अक्सर धोते हैं हम बहुत, आंसू बहाये हमने तकिये में मुंह छुपाकर, समझा ये हर किसी ने सोते हैं हम बहुत.... उर्मिला माधव....

नज़्म

जब बहुत सोचा, निभाने के लिए, दिल ने चाहा, पास जाने के लिए, फ़ासले थे दरमियां, कुछ इस क़दर, जो मिटाने पर भी, मिट पाये नहीं, जागती रातें कसक में, हो गईं तब्दील,जब, हर कराहट,चीखती सी रह गई, गुफ्तगू,जो बेसबब थी, आह भरती रह गई याद करती रह गई, होगया मंज़ूर दिल को, क्यूँ ठगा जाना अबस? और समझा दिल ने वो, हर इक बहाना, कश्मकश, दोस्तों के दरमियां, एक दिल्लगी उड़ती हुई, उसका तन्हाई में पीना, और बहकना बे शुमार, साथ में जोड़े हुए, तोड़े हुए रिश्ते हज़ार, कुछ ख़बर अब तक नहीं क्या सोचता रहता था वो? मुझको बताये आकर, मेरा कसूर क्या था? उर्मिला माधव... 6.12.2016

क़ब्र पर मिट्टी

क़ब्र पर मिट्टी चढ़ाई जा रही है, लाश कुछ गहरी दबाई जा रही है, लग रही है रेत मुट्ठी से फिसलती , हाथ से निकली ख़ुदाई जा रही है, उफ़ पसीना आगया कैसा जबीं पर, ज़िन्दगी भर की कमाई जा रही है, देखना है चश्म-ए-गिर्या में उतर कर, किस तरफ़ ये रहनुमाई जा रही है, दोष पै सर को उठा कर चल रहे हैं, आँख लेकिन नईं उठाई जा रही है ज़िन्दगी देकर हमें बख़्शी है दोज़ख, यार को जन्नत दिखाई जा रही है, शोर मदफ़न से उठा है फिर अचानक, फिर कोई तुरवत सजाई जा रही है। उर्मिला माधव

मुझे कहां कोई चाह रही है

मुझे कहाँ कोई चाह रही है? कब किसकी परवाह रही है ? कभी न थी दरकार मुझे पर,  बिला वज्ह इस्लाह रही है. अपनी दम पर चल कर देखा,  क़दम-क़दम पर राह रही है. टूट गए तब कहाँ कोई था?  जीत गए तो वाह रही है. झुकना अगर नहीं जो चाहा,  अना मिरी लिल्लाह, रही है...  उर्मिला माधव - Urmila madhav

लड़ते चले गए

सब हिम्मतों को जोड़के लड़ते चले गए, हालात थे कि दिल के बिगड़ते चले गए, दिल अपने रंग में था हम अपने रंग में, दोनों ही अपनी बात पै अड़ते चले गए, रोने से हमको उज्र था सो रोये भी नहीं, सबको भरम रहा के अकड़ते चले गए, चाहत थी इब्तिदा की मगर वो नहीं हुई, बस आख़री सिरे को, पकड़ते चले गए, डैने कतर के हम पै ज़माना बहुत हंसा, दुनियां के रंज हमको जकड़ते चले गए... उर्मिला माधव

कल का अख़बार

क्या कल का अख़बार पढ़े हो बाबूजी ? दुनियां का व्यभिचार पढ़े हो बाबूजी? सच बतलाना,क्या-क्या पढ़के आए हो, इक कमसिन की हार पढ़े हो बाबूजी ? दिन भर कोरी बातें करते फिरते हैं, कुल दुनियां बीमार पढ़े हो बाबूजी ? कितनी चीख़ें पढ़ पाए हो काग़ज़ पर, कितना हाहाकार पढ़े हो बाबूजी ? मेरी माँ के आंसू भी तो लिख्खे थे, मेरे घर का द्वार पढ़े हो बाबूजी ? क्या उस पर भी ख़ून के छींटे लिख्खे थे? किस-किस को मक्कार पढ़े हो बाबूजी ? दुनियां से अपराध मिटा के रख देंगे, ये जुमला कै बार पढ़े हो बाबूजी ? प्यार पे दावेदारी अब भी रखते हो ? फिर सब कुछ बेकार पढ़े हो बाबूजी, उर्मिला माधव।

कोई और था

आपकी अपनी कलम थी या वो कोई और था? गालियां झड़ती थीं जिससे,वो भी कोई दौर था ? जब मुहब्बत की उम्मीदें, ..ख़ाक में पिनहां हुईं किस क़दर पहुंची थीं चोटें, इसपे कोई गौर था? आज घर खलिहान के किस्से सुनाते हो किसे ? उन दिनों क्या बात कहने का भी कोई तौर था ? उर्मिला माधव  3.12.2016

ख़ुद ब ख़ुद

पैदा किया है आलमे तनहाई ख़ुद बख़ुद, देखी है हमने वहशते रुसवाई ख़ुद बख़ुद जो-जो हुआ है वो ही तो होना था दोस्तो, जब ज़िन्दगी के हो गए शैदाई ख़ुद बख़ुद, इक फ़ासले के साथ ही चलने की ज़िद हुई, मशहूर ख़ुद को कर दिया, हरजाई ख़ुद बख़ुद, बेलौस चलते-चलते भी डरने लगे थे हम, धड़कन हज़ार हादिसे ले आई ख़ुद बख़ुद, दानिशवरों की भीड़ का हुज्जूम इक तरफ़, हद-हद से बढ़ के आ गई दानाई ख़ुद बख़ुद, इस उम्र भर की दौड़ का हासिल था एक दिन, महशर के रोज़ बढ़ गई रानाई ख़ुद बख़ुद, उर्मिला माधव