लड़ते चले गए
सब हिम्मतों को जोड़के लड़ते चले गए,
हालात थे कि दिल के बिगड़ते चले गए,
दिल अपने रंग में था हम अपने रंग में,
दोनों ही अपनी बात पै अड़ते चले गए,
रोने से हमको उज्र था सो रोये भी नहीं,
सबको भरम रहा के अकड़ते चले गए,
चाहत थी इब्तिदा की मगर वो नहीं हुई,
बस आख़री सिरे को, पकड़ते चले गए,
डैने कतर के हम पै ज़माना बहुत हंसा,
दुनियां के रंज हमको जकड़ते चले गए...
उर्मिला माधव
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