मुझे कहां कोई चाह रही है
मुझे कहाँ कोई चाह रही है?
कब किसकी परवाह रही है ?
कभी न थी दरकार मुझे पर,
बिला वज्ह इस्लाह रही है.
अपनी दम पर चल कर देखा,
क़दम-क़दम पर राह रही है.
टूट गए तब कहाँ कोई था?
जीत गए तो वाह रही है.
झुकना अगर नहीं जो चाहा,
अना मिरी लिल्लाह, रही है...
उर्मिला माधव
- Urmila madhav
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