तुम ही तुम चलते रहे
साथ मेरे तुम ही तुम चलते रहे,
ख़ाब बन कर आँख में पलते रहे,
नींद में झपकाईं पलकें जो कभी,
हाँ ये सच है,आँख तुम मलते रहे,
कितनी हैरत है रहे तुम बे-वफ़ा !!
और अदू के साथ भी चलते रहे!
क्या सुकूं पाया जला कर आग में,
ख़ुद भी अपनी आग में जलते रहे,
ग़र समझते हो अगर खुर्शीद हो,
शाम को अंजाम है.....ढलते रहे,
उर्मिला माधव...
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