बाहम है सो नहीं सकते

जुनून-ए-ख़ाब भी बाहम है सो नहीं सकते
सरापा नींद सा आलम है सो नहीं सकते,

हमारी आंख में पानी सा रुक रहा है कहीं,
ज़माना आज भी बरहम है, सो नहीं सकते,

ये बात है के अभी,अधमरे पड़े हैं कहीं,
हमारे जिस्म का मातम है,सो नहीं सकते,

हमारे कान में इक नज़्म गूंजती है अभी,
बड़ी अजीब सी सरगम है सो नहीं सकते,
उर्मिला माधव

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