हम नहीं समझे

अभी तक हम नहीं समझे तुम्हें किससे मुहब्बत है,
कि या फिर जो भी ज़ाहिर है महज़ कोरी शरारत है?

कभी रो के कभी हंस के, कभी डर के मिले हो तुम,
हमेशा क्यूं ये लगता है तुम्हें नख़रों की आदत है...

हमें इक लफ़्ज़ ही लगता रहा हर पल मुनव्वर सा,
सुना तुमने भी तो होगा, जो कहलाता इबादत है..
उर्मिला माधव

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