उसी जुस्तजू में
उसी जुस्तजू में जिए जा रहे हैं,
जो कह कर गए थे कि ले जा रहे हैं,
हमीं ने तो इज्ज़त भी बख्शी थी उनको,
वही वार हम पर किये जा रहे हैं,
कभी कितने ख़ुश थे,मगर आज बोले,
ज़ह्र ज़ीस्त है और पिए जा रहे हैं,
वो ज़ह्र-ए-ज़ुबां उनका अब तक है तारी,
के हम ज़ख्म अपने सिंये जा रहे हैं,
अजब हाल है उनके गुलशन का देखो,
हवा में भी पत्थर, दिए जा रहे हैं....
उर्मिला माधव
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