क़ब्र पर मिट्टी
क़ब्र पर मिट्टी चढ़ाई जा रही है,
लाश कुछ गहरी दबाई जा रही है,
लग रही है रेत मुट्ठी से फिसलती ,
हाथ से निकली ख़ुदाई जा रही है,
उफ़ पसीना आगया कैसा जबीं पर,
ज़िन्दगी भर की कमाई जा रही है,
देखना है चश्म-ए-गिर्या में उतर कर,
किस तरफ़ ये रहनुमाई जा रही है,
दोष पै सर को उठा कर चल रहे हैं,
आँख लेकिन नईं उठाई जा रही है
ज़िन्दगी देकर हमें बख़्शी है दोज़ख,
यार को जन्नत दिखाई जा रही है,
शोर मदफ़न से उठा है फिर अचानक,
फिर कोई तुरवत सजाई जा रही है।
उर्मिला माधव
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