आह को आह भी नहीं कहते
आह को आह भी नहीं कहते,
इश्क़ को ज़िन्दगी नहीं कहते,
दिल को महदूद रखना अच्छा है
ग़ैर से ग़म कभी नहीं कहते,
गुफ़्तगू में हज़ार ख़म निकलें,
उसको हम सादगी नहीं कहते,
गर चे है फ़िक़्र दीनो दुनियां की,
उसको आवारगी नहीं कहते,
अपनी तबियत में जो फ़क़ीरी है,
इसको बेचारगी नहीं कहते,
फ़र्क़ समझे जो रेत पानी का,
उसको हम तिशनगी नहीं कहते,
उर्मिला माधव
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