नज़्म

जब बहुत सोचा,
निभाने के लिए,
दिल ने चाहा,
पास जाने के लिए,
फ़ासले थे दरमियां,
कुछ इस क़दर,
जो मिटाने पर भी,
मिट पाये नहीं,
जागती रातें कसक में,
हो गईं तब्दील,जब,
हर कराहट,चीखती सी रह गई,
गुफ्तगू,जो बेसबब थी,
आह भरती रह गई
याद करती रह गई,
होगया मंज़ूर दिल को,
क्यूँ ठगा जाना अबस?
और समझा दिल ने वो,
हर इक बहाना, कश्मकश,
दोस्तों के दरमियां,
एक दिल्लगी उड़ती हुई,
उसका तन्हाई में पीना,
और बहकना बे शुमार,
साथ में जोड़े हुए,
तोड़े हुए रिश्ते हज़ार,
कुछ ख़बर अब तक नहीं
क्या सोचता रहता था वो?
मुझको बताये आकर,
मेरा कसूर क्या था?
उर्मिला माधव...
6.12.2016

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