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Showing posts from November, 2025

चलते चलते

चलते-चलते हम कभी मर जाएं तो? इक ख़बर की शक़्ल में घर जाएं तो? ज़िन्दगी का क्या है, थक जानी ही है, इस पे घर वाले भी सब डर जाएं तो? इस की भरपाई भी कर सकते हैं हम, सबके दिल गर प्यार से भर जाएं तो। कुछ भी तब होता रहे जब हम न हों, माना इसकी फ़िक्र भी कर जाएं तो? कुछ समय तो याद सब रहते ही हैं, चोर या फिर मोतबर मर जाएं तो। . उर्मिला माधव

दूर का रिश्ता बहुत नज़दीक था

दूर का रिश्ता बहुत नज़दीक था, जब तलक था दूर बिलकुल ठीक था, :: कुछ निभाने में कमी होगी कहीं, मामला रिश्तों का बस बारीक था, :: यूँ कि ख़ुद मुख़्तार थीं नस्लें नई, ये नतीजा किस्सा ए तसदीक था, :: ग़ालिबन बातों की वो रस्साकशी, हर इरादा मुद्दा ए तज़हीक था, :: मुंह घुमाया और घर को चल दिए, हर क़दम अपना भी एक तहरीक था.... :: #उर्मिलामाधव, :: तस्दीक---- सत्यपन.. तज़हीक----हंसी उड़ाना तहरीक-----आंदोलन.

काम चलाया जा सकता है

रस्ते का भी साथ निभाया जा सकता है, पांव से चलके घर तक जाया जा सकता है, वीरानी को अपना हर ग़म याद दिलाओ, ख़ामोशी के संग चिल्लाया जा सकता है, वक़्त वक़्त पर कभी कहीं भी जा सकते हैं, बिन बोले अहसान चुकाया जा सकता है, अश्क़ पोंछ कर रोने वाले को चुप कर दो, किसी तरह भी प्यार जताया जा सकता है, कोई मुहब्बत करता हो या ना करता हो, झूट बोल कर काम चलाया जा सकता है, जिस्म टूट कर गिरने तक चलते ही रहना, फिर दुनिया में नाम कमाया जा सकता है, उर्मिला माधव

हम बड़ी मुश्किल से

हम बड़ी मुश्किल से इस क़ाबिल हुए हैं, अब कहीं जाकर बहुत मुश्किल हुए हैं, क़द्र करते करते ही बदहाल थे हम, इस जहां में बेसबब बिस्मिल हुए हैं ग़म जहाँ भर के हुए यकजा तभी से, क्या करें ज़ाहिर के अब बेदिल हुए हैं, उर्मिला माधव 29.11.2018

देख लो आवाज़ देकर

देख लो आवाज़ देके कोई शायद सुन ही ले, इतने सारे ज़ख़्म देखे, कोई शायद चुन ही ले, प्यार से आवाज़ देना ये महज़ इख़लाक़ है, ख़ाब अच्छा है,समझ के कोई शायद बुन ही ले, उर्मिला माधव,

दरख़्त तले

मैं रो रही था किसी नीम के दरख़्त तले, ज़रा ये सोच रही थी के कैसे वक़्त टले, मैं सख़्त जान हूँ पर देख कर बयाबानी, डरी हुई हूँ कभी दिल न लख़्त लख़्त गले उर्मिला माधव 

कुछ और करें

हम तिरे ग़म उबर जाएं तो कुछ और करें, तेरे ज़ीने से उतर जाएं तो कुछ और करें, अब ये तक़दीर कहीं और अगर ले जाए, इससे पहले ही जो मर जाएं तो कुछ और करें, अब तो नश्शे में हुए ग़र्क़ हमें होश कहाँ रंगे उल्फ़त से जो डर जाएं तो कुछ और करें, सारी दुनिया से बहुत अच्छा भटक लेते हैं, इस जुनूं में भी जो घर जाएं तो कुछ और करें, अपनी ख़ाहिश है, जहां भर से अलग चलने की, हर मुसीबत से उबर जाएं तो कुछ और करें, उर्मिला माधव

सचमुच कोई चाह नहीं है

सचमुच कोई चाह नहीं है, दुनिया की परवाह नहीं है, कुछ जिस्मानी तकलीफें हैं, ग़म में डूबी आह नहीं है, मैंने सब कुछ जान के छोड़ा, इसीलिए कोई वाह नहीं है 

चल पाओगे

तुम हमारी मुश्किलों के साथ कब चल पाओगे, साफ़ कहते हैं के आधी राह पर रुक जाओगे, कौन आख़िर चाहता है,उम्र भर जलता रहे, गर तड़पते देख लोगे,तुम बहुत घबराओगे, ज़ख़्म मत छेड़ो गुज़ारिश कर रहे हैं ऐ मियां, ज़िद अगर कर जाओगे तो बाद में पछताओगे, इक ज़माना हो गया,हम इश्क़ लिखते ही नहीं, हम अगर लिख्खेंगे तुम ही दस तरह बल खाओगे हम भी तो हर चंद ख़ुद को रोकते रहते हैं बस, फिर भी ना माने तो ठंडी आग में जल जाओगे, उर्मिला माधव,

ख़ूब है

मंसूब है मेरी अपनी ज़िन्दग़ी मेरी नज़र में ख़ूब है, इसलिए हर रंग मेरा ..मुझसे ही मंसूब है, आँख में काजल नहीं ऑ मांग में सुर्ख़ी नहीं, पर मुहब्बत का मुझे मालूम हर उस्लूब है , ये हकीक़त है के उसने आज पर्दा कर लिया, फिर भी मेरी ज़िन्दगी में एक वही महबूब है, जाने कितनी बाज़ियां जीती हैं मैंने उम्र भर  तुमने कैसे कह दिया के दिल मेरा मग्लूब है  मैं नमाज़ी हूँ मुझे हासिल हैं रब की नेमतें, लोग कहते हैं मिरा अंदाज़ ही मज्जूब है, उर्मिला माधव.... 5 .8 .2017 .. उस्लूब--- रीति  मग्लूब---पराजित  मज्जूब--- वो संत जो देखने वालों के लिए बावला हो

भला होगा

मैंने कुछ भी अगर कहा होगा, उससे उसका कहाँ भला होगा, वो जो अल्फ़ाज़ सिर्फ़ सुनता है किस तरहा मुत्मइन रहा होगा, उसको मज़मून से नहीं मतलब, ध्यान मीज़ान पर धरा होगा, वैसे इक ख़त जो मैंने भेजा है, उसने महफ़िल में ही पढ़ा होगा, ख़ुद तो पत्थर सा बन के बैठा है, दिल भी पत्थर का ही बना होगा, जो है आदत से अब भी हरजाई, जाने वो किस तरहा बड़ा होगा, उर्मिला माधव

दिल पर निशान देखा है

हमने दिल पर निशान देखा है, उसने बस आसमान देखा है, जब कभी बाम पर कहीं पहुंचे, पहले बस पायदान देखा है, हर मकीं छोड़ कर चला जाये, इतना ख़ाली मकान देखा है..... उंसियत कोई भी नहीं रखता, हमने सारा जहान देखा है... अपने गुंचों से दुश्मनी रख्खे ऐसा भी बाग़बान देखा है... पहले खुर्शीद की जलन देखी, तब कहीं सायबान देखा है... उर्मिला माधव..

एजाज़ था

हर सदा का मिरी उसको एजाज़ था, फ़िर भी उसने कभी मुड़के देखा नहीं, उसको अंदाज़ा था मेरी तक़लीफ़ का, वो जो उम्मीद थी उस को तोड़ा नहीं, फ़िर कलेजे पे ग़म की परत जम गई, मुझको ख़ामोशियों ने झिंझोड़ा नहीं, वो यूँ ही रोज़ आता ऑ जाता रहा, मुझको ज़िद सी रही उसको टोका नहीं, मुझको वीरानियों ने रुलाया बहुत, रिश्ते बोसीदा थे, फ़िर भी छोड़ा नहीं, अपनी चाहत में उसको रखा तो मगर, ऐसे जैसे कभी उसको चाहा नहीं, उर्मिला माधव

उसने पूछा भी नहीं

उसने पूछा भी नहीं,मैंने बताया भी नहीं, वक़्त-ए-रुख़सत वो मुझे देखने आया भी नहीं, आंखें झपकीं न गईं मुझ से बहुत देर तलक, लोग ग़फ़लत में रहे,जिस्म उठाया भी नहीं... आगया फिर वो निभाने को यूं ही रस्म-ए-चराग़, कांपती लौ को हवाओं से बचाया भी नहीं, उर्मिला माधव,

पढ़ के देखिए

खुद आईने के आगे ज़रा पड़के देखिये, चेहरा किताब है तो ज़रा पढ़के देखिये, गैरों पे हंस रहे हैं मियाँ बे-वज्ह ही आप , ख़ुद की भी फितरतों से ज़रा लड़के देखिये, ख़ुरशीद के तले जो जले दूर हैं वो दश्त,   छत पर ही नंगे पाँव ज़रा चढ़के देखिये, होती है कारगर भी दुआ दिलसे कीजिये,  होगा यकीन जिद पे ज़रा अड़के देखिये, बनती है बिगड़ी बात भी कोशिश तो कीजिये , अपनी तरफ से खुद भी ज़रा बढ़के देखिये.. रख लीजिये तो दिलपे ज़रा हाथ साहिबान, बाबस्ता अपने किस्सा कोई गढ़के देखिये, कोई चला जो साथ मैं मुश्किल मुकाम तक, ता-उम्र उसके प्यार को बढ़-चढ़के देखिये... उर्मिला माधव... २१.११.२०१३.

भूल है

मृत्यु को हम क्रूर कहते......ये हमारी भूल है, येही जीवन चक्र है तब किस तरह प्रतिकूल है?? जन्म के ही साथ मृत्यु सर्वथा निश्चित यहाँ, सत्यता से बचके चलना हर तरह...निर्मूल है... उर्मिला माधव... 20.11.2014...

ख़तम हो रहा है

न ये दर्द-ए-दिल ही ख़तम हो रहा है, के अब सब्र मेरा भी कम हो रहा है, के आँखें बरसने-बरसने को आयीं, ये दिल भी अजब है कि नम हो रहा है,   मुझे खुद पै हंसने को जी है बहुत ही, खुदा से भी बढ़के सनम हो रहा है, बहुत झुक गया है मेरा सर ज़मीं पर, कि घर मेरा दैर-ओ-हरम हो रहा है, मेरी सांस रुक-रुक के चलने लगी बस, लो अब एड़ियों में ही दम हो रहा है.... उर्मिला माधव... 21.11.2014....

प्यार लिख दूं

दिल तो शर्माता है फिर भी,तुम कहो तो प्यार लिख दूँ, और तुम्हारे दिल के आगे,अपने दिल की हार लिख दूँ ? प्यार के इन दायरों में बंध के रहना है तो मुश्किल, पर किसी दीवार के कोने में इक इज़हार लिख दूँ, दिल ये कहता है,............तुम्हीं मख़सूस हो मेरे लिए, सोचती हूँ दिल ही दिल में,तुमको मैं "दिलदार" लिख दूँ.... ज़िन्दगी तो हर क़दम ........दुश्वारियों का नाम है बस इन्हीं दुश्वारियों में,इश्क़ का किरदार लिख दूँ उर्मिला माधव.... 21.11.2016

कुत्ते के कराहने की आवाज़

बहुत दूर कहीं  एक कुत्ते के कराहने की आवाज़, बहुत वीराना सा लगता है, दहशत सी लगती है, सूखे पत्तों की आहट, जैसे कोई अँधेरे में चलता हो, ज़िन्दगियों का जायज़ा  लेने निकलता हो, वहशत होती है, जैसे कोई याद आता हो, मेरा साथ कहाँ है?, मेरा दूसरा हाथ कहाँ है, ये क्या है? अपनी भी ख़बर नहीं, पर मुझे कोई डर नहीं, जाती हूँ ऒर आती हूँ दूसरा हाथ ले के, कुत्ता तो ख़ामोश हो गया, लगा जैसे उम्र भर को सो गया, मुझे जाना होगा, कुत्ते को क्या हुआ  हे माँ,पर तुम भी तो नहीं, माँ, बरसों हुए गए हुए, लौटती क्यों नहीं माँ, याद तो आती है  माँ ही नहीं आती, कुत्ता भी वहीँ गया लगता है, मुझे भी जाना है, मैं थक गई हूँ उर्मिला माधव 23.11.2016

हैरानी नहीं जाती

ये दुनियां इस क़दर उलझी है,पहचानी नहीं जाती, अजब एहसास से लड़ती हूँ, हैरानी नहीं जाती, अज़ल से ढूंढती फिरती हूँ, इक बेदाग़ सा दामन, किसी सूरत भी इस दिल की ये वीरानी नही जाती, ~उर्मिला माधव

ज़ख़्म सींना मेरा नसीब है क्या?

ज़ख़्म सींना मेरा नसीब है क्या ? तेरी दुनियां कोई सलीब है क्या? मेरी आवाज़ जब लरजती है पूछते हैं कोई अदीब है क्या? सांस क्यों ज़िन्दगी पे भारी है, ज़िन्दगी मौत के क़रीब है क्या? तूने तक़लीफ़ इतनी क्यों दी है, तू गए वक़्त का रक़ीब है क्या ? एक हवा तक इधर नहीं आती, ये बता रब भी अब ग़रीब है क्या ? उर्मिला माधव.. 19.11.2016

मनुज

मनुज जब गर्वित होता है, समय परिवर्तित होता है, ज्ञान भी दान में नहीं मिलता, श्रम सहित अर्जित होता है, उर्मिला माधव 

मेरे होने से

मेरे होने से मच गई हलचल, जब मेरी आंख हो गई जलथल, ज़ेह्न बस लौटने को कहता था, एक ख़्वाहिश थी रुक गई उस पल, मैं अकेली ऑ भीड़ ज़्यादा थी, दिल में हर चंद हो गई खलबल, इम्तेहां सब्र का हुआ ज़ाहिर, राह ख़ुद चलके आ गई,बढ़चल, उर्मिला माधव.

चंद शेर

चंद शेर बेसबब क्यूं क़द्र आख़िर ज़िन्दगी की हम करें? मरके जीने के अलावा और क्या करते हैं हम ?? चश्म-ए-गिरया,टूटते दिल,और,फ़क़त,तन्हाइयां, दर्द पीने के अलावा और क्या करते हैं हम ?? चाक दामन,हाल ख़स्ता और कुछ पैवंद बस , ज़ख्म सीने के अलावा और क्या करते हैं हम ?? उर्मिला माधव...

मन तक रक्खा है

हमने अपना आपा मन तक रक्खा है, मन का हर संताप मनन तक रक्खा है, श्रवण शक्ति को सीमाओं में बांध लिया, जी का सारा क्लेश हवन तक रक्खा है, आवश्यकता अपनी सीमित है बिल्कुल, केवल भोजन और वसन तक रक्खा है, श्वास सुमिरनी मंथन जग का करती है, जीवन प्रतिदिन भाव भजन तक रक्खा है, उर्मिला माधव

इक तरफ़

इक तरफ़ कुछ धुंआं सा उठता है, इसमें कुछ ग़म निहां सा लगता है, हर तरफ़ अजनबी सा आलम है, जैसे वक़्त-ए-गराँ सा लगता है, अब तो बस एक सम्त ख़ाली है, वो के जो ....आसमान वाली है, उर्मिला माधव

तस्वीर है

जो तुम्हारी ख़ास एक तस्वीर है, वो मेरे दिल की अजब ज़ंजीर है, jo tumhari khaas ek tasviir hai, wo mere dil kiajab zanjeer hai, वो मुझे अपनी सी लगती है सुनो, उसकी सीरत इन्तेहाई शीर है, wo mujhe apnii sii lagti hai suno, uski siirat intehaaii sheer hai, बिन तुम्हारे दिल बहुत बेचैन था, ये महज़ बिछड़े दिनों की पीर है, bin tumhare dil bahut bechain tha, ye mahaz bichhde dinon kii peer hai, रात दिन बाबत तुम्हारे सोचना, क्यूँ मेरे दिल पै रखी शमशीर है, raat-din baabat tumhare sochna, kyun mere dil pe rakhi shamsheer hai, लौट कर आना तो उनको है नहीं, तयशुदा है बस यही तक़दीर है,... laut kar aanaa to unko hai nahin, Tayshuda hai bs yahi taqdeer hai.. #उर्मिलामाधव... 18.11.2015

हम राज़ खो गए

अब ज़िंदगी के मेरे सब अंदाज़ खो गए, कोई ज़ोर से बोला तो सब अल्फ़ाज़ खो गए,   इक जलतरंग जो मिरे अंदर की गूंज थी, जब ढूंढने पे आई तो अब साज़ खो गए, अब हम क़दम कोई ना हम राज़ है मेरा, जो साथ में थे मेरे सब हमराज़ खो गए, उर्मिला माधव 

कसती लग रही है

अब हमें दुनिया खिसकती लग रही है, मुश्किलों के बीच फंसती लग रही है, हौसला चलने का जैसे थक गया हो, पांव पर जंजीर कसती लग रही है,

बेज़ार किए रहता है

हमारी बात को बाज़ार किए रहता है, सारे जज़्बात ही बेकार किए रहता है, असीर ए ज़ब्त हैं अब और क्या बताएंगे, ज़ख़्म ए हालात ही बेज़ार किए रहता है, उर्मिला माधव 

नेज़े ही नेज़े हैं

एक यही बात तो रह-रहके दिल में आती है, नेज़े ही नेज़े हैं और एक मेरी छाती है, मेरी मजलूम सी ख्वाहिश का वली कोई नहीं, दिल के कहने को हर इक बात रही जाती है, यूँ भी सोचा के हवा से ही शुरू करते हैं,  फिर ख़याल आया कहीं ऐसे कही जाती है? पासे ग़म ,रस्म-ए हया और हज़ारों मुश्किल, कैसे बतलाऊं ये आदत ही नहीं जाती है, मेरी बीनाई सभी दूर से तकती ही रही, ग़म का दरिया है मेरी लाश बही जाती है...... उर्मिला माधव...  15.11.2014... नेज़े--- भाले मजलूम---अनाथ, पासे अदब--- अदब का लिहाज़, रस्मे हया---शर्म की रीति, बीनाई--- दृष्टि...

वक़्त भी ख़र्चा न किया

कोई हीलः न किया,कुछ भी तमाशा न किया, मैंने बस इतना किया हश्र का जलवा न किया, तेरी बातों की अदा मुझको धमक देती रही, मैंने बस इतना किया गैर से चर्चा न किया... तूने दुश्मन की तरह पूरे इरादे रख्खे, मैंने बस इतन किया,यार को रुसवा न किया, मुझसे लोगों ने कहा यार बहुत अहमक हो, मैंने बस इतना किया,कोई भी शिकवा न किया... गाम दर गाम मुझे लोग ख़बर करते रहे, मैंने बस इतना किया कोई भी फतवा न किया. तेरी मिहनत तो अदावत को हवा देती थी,  मैंने बस इतना किया वक़्त भी ख़र्चा न किया... उर्मिला माधव... 15.11.2014...

आलम

 जो आलम है बदहवासी का, जैसे मौसम है ग़म शनासी का, क़द्दे आदम सी एक मूरत है, इसमें जलवा है संगतराशी का,

शीशे में बाल आया हुआ

जा नहीं सकता कभी शीशे में बाल आया हुआ, दिल भुला देगा कभी उनका ख़याल आया हुआ जाने किस-किस शक्ल से उठती रही हैं उँगलियाँ, जैसे मेरी सादगी पर हो सवाल आया हुआ, ग़म शनासी की तलब करती नहीं बेचैन अब, देख लीजे ज़िन्दगी में है कमाल आया हुआ, कुछ लकीरों में रहेंगी ख़ामियां तकदीर की, आसमां देखेगा बस दिल पर मलाल आया हुआ उर्मिला माधव

दोस्तो

आग में आग भड़का रहा दोस्तों, काम पानी का फिर क्या रहा दोस्तो?? आग,रूहानी हो,आग जिस्मानी हो, ज़िन्दगी ही जली बारहा दोस्तो, उम्र भर तो जले,मर के भी जल गए, खेल क़ुदरत का ये क्या रहा दोस्तो?? आशिक़ी में जले,जल गए वस्ल में, आदमी क्या सिला पा रहा दोस्तो?? रौशनी के लिए शम्मा रौशन करे, सिर्फ़ धोका ही तो खा रहा दोस्तो.... उर्मिला माधव... 3.11.2014...

कब चल पाओगे

तुम हमारी मुश्किलों के साथ कब चल पाओगे, साफ़ कहते हैं के आधी राह पर रुक जाओगे, कौन आख़िर चाहता है,उम्र भर जलता रहे, गर तड़पते देख लोगे,तुम बहुत घबराओगे, ज़ख़्म मत छेड़ो गुज़ारिश कर रहे हैं ऐ मियां, ज़िद अगर कर जाओगे तो बाद में पछताओगे, इक ज़माना हो गया,हम इश्क़ लिखते ही नहीं, हम अगर लिख्खेंगे तुम ही दस तरह बल खाओगे हम भी तो हर चंद ख़ुद को रोकते रहते हैं बस, फिर भी ना माने तो ठंडी आग में जल जाओगे, उर्मिला माधव, 2.11.2017