सचमुच कोई चाह नहीं है

सचमुच कोई चाह नहीं है,
दुनिया की परवाह नहीं है,

कुछ जिस्मानी तकलीफें हैं,
ग़म में डूबी आह नहीं है,

मैंने सब कुछ जान के छोड़ा,
इसीलिए कोई वाह नहीं है 

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