मन तक रक्खा है

हमने अपना आपा मन तक रक्खा है,
मन का हर संताप मनन तक रक्खा है,

श्रवण शक्ति को सीमाओं में बांध लिया,
जी का सारा क्लेश हवन तक रक्खा है,

आवश्यकता अपनी सीमित है बिल्कुल,
केवल भोजन और वसन तक रक्खा है,

श्वास सुमिरनी मंथन जग का करती है,
जीवन प्रतिदिन भाव भजन तक रक्खा है,
उर्मिला माधव

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