इक तरफ़

इक तरफ़ कुछ धुंआं सा उठता है,
इसमें कुछ ग़म निहां सा लगता है,
हर तरफ़ अजनबी सा आलम है,
जैसे वक़्त-ए-गराँ सा लगता है,

अब तो बस एक सम्त ख़ाली है,
वो के जो ....आसमान वाली है,
उर्मिला माधव

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