ज़ख़्म सींना मेरा नसीब है क्या?
ज़ख़्म सींना मेरा नसीब है क्या ?
तेरी दुनियां कोई सलीब है क्या?
मेरी आवाज़ जब लरजती है
पूछते हैं कोई अदीब है क्या?
सांस क्यों ज़िन्दगी पे भारी है,
ज़िन्दगी मौत के क़रीब है क्या?
तूने तक़लीफ़ इतनी क्यों दी है,
तू गए वक़्त का रक़ीब है क्या ?
एक हवा तक इधर नहीं आती,
ये बता रब भी अब ग़रीब है क्या ?
उर्मिला माधव..
19.11.2016
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