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Showing posts from October, 2021

madhuvan ka kalaam

मेरे बेटे मधुवन की एक रचना.... ऐसा लगता है कि कुछ होगा मगर होता नहीं, रास्ता वा है मगर अपना सफ़र होता नहीं, वक्त की उन साअतों का भूलना पूरी तरह, उस तरफ़ तो हो गया है पर इधर होता नहीं, इन हवाओं में वही अावाज़ है उसकी निहाँ, वो कहीं कुछ बोलता है पर नज़र होता नहीं, है कमाल-ए-वक्त जो है अाज चर्चा आपका, वरना कोई भी यहाँ पर बाहुनर होता नहीं, इश्क में उसके ये दिल बेदार है अब इस कदर,  होश खो देता है लेकिन बेखबर होता नहीं, दार पे चढ़के भी उसका ज़िक्र है दर ख़ासो आम,  वो फ़ना तो हो गया है, बेअसर होता नहीं.... Madhuvan Rishiraj...... 31.10.2014..

kis tarah tumse kahun

एक मतला एक शेर.... किस तरह तुमसे कहूँ आजाओ ना, नईं समझती हूँ मुझे समझाओ ना, बात तक मेरी नहीं सुनते हो तुम, अब नहीं बोलूंगी तुम से जाओ ना, उर्मिला माधव... 31.10 2014...

aankh ke niche ki kaali jhaainyan

आँख के नीचे की काली झाइयां, और सारी उम्र की तन्हाईयाँ   घेरती हैं अब सवालों से मुझे, आज गुज़रे वक़्त की परछाईयाँ, यूँ भी कहते ही नहीं बनता है कुछ,   जब ये मुझमें खोजें हैं रानाईयाँ, जो भी गुज़रा हो मगर इतना रहा, ज़िन्दगी ने नाप लीं गहराइयाँ , पाँव तो हर दम ज़मीं पर ही रहे  चश्म-ए-नम से देख लीं ऊँचाइयाँ, दिल मेरा अनहद कहीं सुनता रहा  दूर कुछ बजती रहीं शहनाइयाँ ---- #उर्मिलामाधव... 31.10.2015

nazm uunhun

अहम् से वहम तक, कामयाबी,ऊँहूँ, दिल नवाज़ी--ऊँहूँ, कुछ तबाही--?हम्म, ग़म गुसारी..?ऊँहूँ, दर्द तारी..हम्म जां निसारी ..?ऊँहूँ, भूल जा सब... उर्मिला माधव 31.10.2015

aazmaana chahiye

फिल बदीह में अभी-अभी कही गई ग़ज़ल--- :: है ये नेमत ज़िन्दगी तो आज़माना चाहिए, जो भी कुछ मिल जाए उसपे,मुस्कुराना चाहिए, :: hai niyamat zidagi to aazmaanaa chahiye, jo bhi kuchh mil jaaye uspe,muskurana chahiye... :: बेखुदी में मुब्तिला होकर नहीं रहना यहाँ, हंसके रोना,रोके हँसना,कुछ तो आना चाहिए, :: bekhudi main mubtila hokar nahin rahna yahan, hanske rona,roke hansna,kuchh to aanaa chahiye, :: खुशनसीबी से अगर इक दोस्त भी मिल जाए तो, दोनों हाथों से उसे ........बढ़कर निभाना चाहिए, :: khush nasiibi se agar ik dost bhi mil jaaye to, donon hathon se use badh kar nibhaana chahiye, :: कौन जाना है इसे ये ज़िन्दगी क्या खेल है, ये समझने के लिए तो एक ज़माना चाहिए, :: kaun samjha hai ise ye zindagi kya khel hai, ye samajhne ke liye to ek zamaana chahiye, :: जाने कितने मिट गए मुफलिस,तवंगर,दह्र में, हर किसीको अपने हक का आब-ओ-दाना चाहिए. :: jaane kitne mit gaye,muflis,tavangar dahr main, har kisiko,apne haq ka,aab-o-daanaa chahiye, #उर्मिलामाधव-- 31.10.2015

usne kr liya

जो उसे करना था उसने कर लिया, मैंने बस इलज़ाम अपने सर लिया, फासले दिल में मुक़म्मल हो गए, और दामन इक धुंए से भर लिया, मुतमईँ कोई हो गया उससे बहुत, मैंने हिस्से में महज़ एक डर लिया, सोचती रहती हूँ ......अब तन्हाई में, इस क़दर क्यों फैसला बदतर लिया, गुफ्तगू का वक़्त भी आया बहुत, मैंने मौजू,जान कर, दीगर लिया... खुश रहा वो भी मुझे कम आंक कर, दिल मेंरा उसपे फ़क़त हंस भर लिया... उर्मिला माधव... 31.10.2016

deewali

न जाने किस जगह जा कर छुपी है अब वो दीवाली, चरागाँ जब दर-ओ-दीवार होते थे हर इक घर के,  मुहब्बत से भरे होते थे रिश्ते .....जब वो पीहर के, ज़रा सी बात पर खुशियां,नज़र आती थीं चेहरे पर, कभी अम्मा से छुप के पंख भी चुनते थे तीतर के, मगर मज़हब की कालिख़ से हर इक दीवार है काली, न जाने किस जगह जा कर छुपी है अब वो दीवाली, उर्मिला माधव... 31.10.2016

nazar se nazar ko mila

नज़र को नज़र से मिला करके देख, कभी ख़ुद को यां तक भी ला करके देख कभी मेरे दिल को हिला करके देख, बनाया मुझे जिसने तबियत से ख़ूबाँ, मेरे कूज़ागर से गिला कर के देख, सबाब-ए-मुहब्बत तवारीख होगी, किसी मर्ग-ए-दिल को जिला कर के देख, तुझे राहतों की भी नेमत मिलेगी  कोई चाक दामन सिला करके देख, तेरी ज़िन्दगी को ही तस्कीन होगी, कभी हक किसीका दिला करके देख.... उर्मिला माधव... 31.10.2016

हां हां कर गया

बस जुदा होकर हरासां कर गया, ज़िन्दगी लेकिन चरागां कर गया, जब ये पूछा साथ तो चल पाओगे ? उलझनों में था सो हाँ हाँ कर गया, देखते बनती थी उसकी कश्मकश, मुस्कुराने भर को सामां कर गया, क्या ये कम है ज़िन्दगी के वास्ते, ख़लवतों की राह आसां कर गया दूर तक .देखा किये हम रहगुज़र, दिल का इक कोना सा वीरां कर गया, उर्मिला माधव ..

zakhm e duniyan ka gham

ग़ज़ल हाज़िर है------ ज़ख्म-ए-दुनियां का ग़म छुपाने को वक्ती लम्हा उधार करते हैं,  जिससे तक़लीफ दिल को होती है,वो ही हम बार-बार करते हैं.... सबको मालूम है ये ग़म क्या है,ऐसे रस्ते का पेच-ओ-ख़म क्या है, दर्द-ए-दिल क्या है,क्या है ख़ामोशी फिर भी सब प्यार-प्यार करते हैं, जाने कैसी ये अब रिवायत है,बस मुहब्बत ही इनकी आयत है, क़ैस-ओ-लैला की तर्जुमानी बन,अपने दामन को तार करते हैं, कुछ ही लम्हों की ज़िंदगानी है,सब ही वाक़िफ़ हैं के ये फ़ानी है, झूठे लम्हों की खैर ख्वाही में अपनी इज्ज़त को ख़्वार करते हैं, हर मुहब्बत को सिर्फ हामी है,ये ही इंसानी दिल की ख़ामी है, अच्छी ख़ासी हसीन दुनिया को अपनी तबियत से दार करते हैं.... उर्मिला माधव.... 30.10 2014...

faaltu baaton me kuchh

फ़ालतू बातों में कुछ रख्खा नहीं था, आप जो कहते थे वो अच्छा नहीं था, तंज,दूरी और फ़क़त लानत,मलामत, एक मुहब्बत के अलावा क्या नहीं था ? कितनी ज़्यादः कोशिशें कीं सीखने की, क्या करें हमको ही कुछ आता नहीं था, जब भी लाया आपका पैगाम क़ासिद, डर गए बस हमने वो खोला नहीं था, इक वफ़ा ही आपकी फितरत नहीं थी, सब समझता था ये दिल बच्चा नहीं था, हम हमेशा चुप रहे कुछ आदतन ही, बोल सकते थे मगर चाहा नहीं था ....... #उर्मिलामाधव... 20.8.2014...

nishana teer ka sadha

निशाना तीर का उसने बड़ी तरकीब से साधा, के जो भी सामने आया,कहा उसको ज़रा बचके.... किसे गद्दीनशीं होंना है,इसका फैसला होगा, मुताबिक वक़्त के बदलेंगी शक्लें कुछ ज़रा हटके... उर्मिला माधव... 30.10.2016

नहीं सुधरी

मैं जिस्म जीती रही,ज़िन्दगी रही बिखरी, अजीब ज़िद थी,किसी तौर भी नहीं सुधरी, हम उम्र भर जिसे खोके हवास, रोया किये, वो चीज़ क्या थी,कभी ज़ेह्न से नहीं उतरी, हर एक सम्त लगी डूबती है नब्ज़-ए-हयात, उठाके फिरती रही झोलियों में बे-ख़बरी, उर्मिला माधव

खुशबू नज़्म

अब कहीं ख़ुशबुएं नहीं आतीं, आग के बीच में है घर अपना, बंद आंखों में दम निकल जाए, आंख खोलें तो ख़ाब ढल जाए, अब कहीं ज़िन्दगी नहीं मिलती, जो भी मिलता है जाने क्या है वो.. उर्मिला माधव

चूर जिंदगी

सीने में जलन,थक के हुयी चूर ज़िन्दगी, देखी कहाँ है आज तक पुर नूर ज़िन्दगी, वो कौन सी जगह है जहाँ हम भी हंस सकें, खुशियों से रंगा-रंग हो भरपूर ज़िन्दगी, कितने दिलों में बच रहा तूफ़ान प्यार का, कितनों को रास आ गई मग़रूर ज़िंदगी.... जब भी उठाये हाथ हैं कुछ मांगने को आह  मिल तो गयी है ज़िन्दगी रंजूर ज़िन्दगी, जीने की आरज़ू में बहुत दिन गुज़र गए,    अब ले भी जाओ मुझसे बहुत दूर ज़िन्दगी,  #उर्मिलामाधव... २९.१०.२०१३.

गैर तरही ग़ज़ल

ग़ैर तरही ग़ज़ल---- जो अब तक कर रही हूँ मैं,वही फिर-फिर करुँगी मैं, लगेगी ठेस गर दिल को,ग़ज़ल हाज़िर करुँगी मैं, कोई जज़्बात अपने दिल में रखके रो नहीं सकती, जो गर आज़ार हो, अल्फ़ाज़ से ज़ाहिर करुँगी मैं, अयां होती रही हैं कुल जहाँ की साज़िशें मुझ पर, भला ऐसे ज़माने का भी क्या आख़िर करुँगी मैं, दिमाग़-ओ-दिल की ताबानी,कभी पिन्हाँ नहीं होती, फ़क़त किरदार की दम पर,जहाँ ताहिर करुँगी मैं, अगर उन्वान इज़्ज़त है तो फिर क़ुर्बान है सब कुछ, ख़लिश की हर हदों तक ज़िंदग़ी माहिर करुँगी मैं... #उर्मिलामाधव.. 27.10.2015

हुजूम ए दुश्मना

इक हुजूमे-ए-दुश्मनां, सामने है रायगां, उफ़ मुहब्बत के लिए !! किस क़दर हैं बदगुमां, जिसने बख़्शी ज़िन्दगी, वो ही देगा सायबां, खुद-ब-खुद करना सभी, कौन किसपे मेहरबां, वक़्त देखा बदतरीन, था सभी कुछ तो निहां....   किसलिए हो फ़िक्र तब, ये बताओ जान-ए-जां, उर्मिला माधव.... 26.10.2016... Ik hujoom-e-dushmanaN, Saamne hai raygaN, Uf muhabbat ke liye, Kis qadar hai badgumaN, Jisne bakhshi zindagi, Wo hii dega saybaN, Khud-b-khud karna sabhi, Kaun kispe meharbaN, Waqt dekha badtar een, Tha sabhi kuchh to nihaN, Kis liye ho fiqr tab, Ye batao jan-e-jaN, Urmila Madhav

शक्ल ए हबाब क्या है

मालूम होगा आपको शक्ल -ए-हबाब क्या है, कांटों का साथ है तो हुस्न-ए-गुलाब क्या है, ये ज़िन्दगी है इसमें, उजलत नहीं ज़रूरी, मर्ग-ए-बशर ये समझे हश्र -ए-शबाब क्या है, उर्मिला माधव

मफ्लूक समझ

एक मतला तीन शेर.. ---------------------  मुझको मफ्लूक समझ कर ही उसने छोड़ दिया, ऐसा बे-फ़िक्र हुआ दिल को लिया.....तोड़ दिया, चाँद-ओ-अख्तर भी हुए देख के......हैरत अगेज़, क्या है ये शख्स जो पत्थर पे सर को फोड़ दिया!! हाथ को अपने कलेजे पे फिरा के ही सांस लेते थे, उसने कुछ ऐसा किया दिल ही...बस मरोड़ दिया, कुछ भी पूछा ही नहीं तुम पे क्या गुजरी .तालिब? इतनी क़ुव्वत ही कहाँ थी कि बस झिंझोड़ दिया?? उर्मिला माधव... २८.१०.२०१३ मफ्लूक-----दरिद्र  क़ुव्वत----- शक्ति.. अख्तर------तारे  हैरत-अंगेज़ ---आश्चर्य चकित..

हमारे साथ हो

हो कहीं भी तुम,हमारे साथ हो, ज़िंदगी की इस तरह सौगात हो, ज़िन्दगी ये चाहती है तुमसे अब, तुमको देखूं दिन हो चाहे रात हो, वो तुम्हारा मुस्कुराना बज़्म में,  कौन नईं मर जाए जो ये बात हो, एक दिन ऐसा भी आया चाहिए, तुम रहो ऑ रात भर बरसात हो, मावरा दिल दर्द से हो जायेगा, हाथ में जिस दम तुम्हारा हाथ हो.....  उर्मिला माधव... 28.10.2014....

इज़तराबे मुसलसल

एक मतला--- jo iztarab-e-musalsal he usey rahne do, paanv se sar se jo ghayal hai usey rahne do, :: जो इज़्तराब -ए-मुसलसल है उसे रहने दो, पाँव से,सर से जो घायल है...उसे रहने दो.... #उर्मिलामाधव.. 28.10.2015

सीना रहा फ़िगार

सीना रहा फ़िगार मेरा जिस्म तार-तार, इस वक़्त ने सज़ाऐं मुझे दी हैं बार-बार.. उर्मिला माधव... 28.10.2016

जिस्म सादा था

जिस्म सादा था कई ज़ख़्म-ए-जिगर रहते थे, मिलने वाले भी हमें मगर मर्ग-ए-बशर कहते थे, Jism saadA tha,kaii zakgm-e-jigar rahte the, Milne waale bhi hmen marg-e-bashar kahte the हाथ हम रात भर सीने पे रखे रहते थे जो भी कहना था हमे वक़्त-ए-सहर कहते थे, Urmila Madhav

सिरहाने रख रही हूं

एक मतला दो शेर --- मैं किताबें अब सिरहाने रख रही हूं, चंद वरकों में ज़माने रख रही हूं, Main kitaben ab sarhane rakh rahi hun, Chand varkon me zamaane rakh rahi hun, हर वरक संजीदगी के नाम है, एक माज़ी सोलह आने रख रही हूं, Her varak sanjiindagi ke naam hai, Ek maazi solah aane rakh rahi hun, एक खनक आहों के हिस्से की भी है, सबके अपने-अपने ख़ाने रख रही हूं, Ek khanak aahon ke hisse kii bhi hai, Sabke apne-apne khaane,rakh rahi hun.. उर्मिला माधव, 28.10.2017

गिला ही क्यों हो

पुराने पन्नों से----!! ------------------!! हमें किसीसे गिला ही क्यूँ हो ?? जिसे जो कहना हो कहले आके, कि जिस चलन से निबाहीं हमने, कभी तो कोई यूँ सहले आके, जिसे हो दावा बुलन्दियों का, कटा ले गरदन वो पहले आके, न कुछ नुमायाँ सिवाय वहशत, है कोई इस घर में रहले आके?? यूँ एक गुँचा फफक के रोया, क्यूँ लोग गुलशन में टहले आके?? हमारे हाथों में दम कहाँ कुछ ?? जो कोई चाहे वो बहले आके..... उर्मिला माधव.. २७.१०.२०१३..

आईना हूं इंग्लिश वर्जिन

ख़ुद ही सूरत,ख़ुद-ब-ख़ुद ही आईना हूँ देख लो, ख़ुद रुबाई खुद-ब-ख़ुद हम्द-ओ-सना हूँ देख लो, :: khud hii surat,khud-b-khud hii aaiinaa hii dkh lo, khud rubaii,khud-b-khud hamd-o-sanaa hun dekhlo :: पाक़-ओ-ताहिर दिल ये मेरा ग़ैर का तालिब नहीं, ख़ुद ही चाहत ख़ुद-ब-ख़ुद ही आशना हूँ देख लो, :: paaq-o-tahir dil ye mera,gair ka talib nahin, khud hii chaht,khud-b-khud hii aashnaa hun dekh lo, :: ख़ुद-ब-खुद दीवानगी हूँ,होश भी हूँ,ख़ुद-ब-खुद ख़ुद तग़ाफ़ुल ख़ुद-ब-ख़ुद ही मैं अना हूँ देख लो, :: khud-b-khud deewangi hun,hosh bhi hun,khud-b-khud khud tagaful,khud-b-khud hii main anaa hun dekh lo, #उर्मिलामाधव.. 27.10.2015

आईना हूं देख लो

ख़ुद ही सूरत,ख़ुद-ब-ख़ुद ही आईना हूँ देख लो, ख़ुद ही चाहत ख़ुद-ब-ख़ुद मैं आशना हूँ देख लो, पाक़-ओ-ताहिर दिल ये मेरा ग़ैर का तालिब नहीं, ख़ुद रुबाई खुद-ब-ख़ुद हम्द-ओ-सना हूँ देख लो, ख़ुद-ब-खुद दीवानगी हूँ,होश भी हूँ,ख़ुद-ब-खुद ख़ुद तग़ाफ़ुल ख़ुद-ब-ख़ुद ही मैं अना हूँ देख लो, #उर्मिलामाधव.. 27.10.2015

मनाही नहीं सूरत देखने की फ्री वर्स

मनाही नहीं,सूरत देखने की, पर इसे पढ़ना भी है दिल से नहीं दिमाग़ से, कितने फरेब लिखे हैं मुश्किल है ऐसे चेहरों की इबारत पढ़ना सूरत जितनी दिलकश, उतनी उलझी हुई इबारत, तुमने सुना भी होगा सखी? ऑल दैट ग्लिटर्स इज़ नॉट गोल्ड यानि हर चमकने वाली चीज़ सोना नहीं इसलिए ख़ुद को खोना नहीं कितने सुहाने लगते हैं दूर के ढोल, पर पास जाकर सुनना कभी कान तो क्या, दिलो दिमाग़ भी हिल जाएंगे रोज़ पढ़ती हूँ मैं उस चमकीली सूरत को रोज़ लड़ती हूँ अपने आप से, उस चेहरे से रोज़ाना मेरे दिल की दूरी कुछ और बढ़ जाती है फ़रेब उसका रोज़ ही कुछ और ज़ियादा दिखाई देता है ये खरा सच है उस सूरत के हिस्से का जो जानना ज़रूरी है,तुम्हारे लिए, ये जो दूरी है,अच्छी है तुम्हारे लिए सूरत खुश है, फ़रेब रचकर, और मैं, उस पर हंस कर उसकी आदत में शामिल है, मुझे कम से कम करके आंकना उसी सूरत की बाबत है ये सब जो अचानक ही तुम्हारे मन को बहुत भा गई है दूरियां सुहानी हैं इन्हें क़ायम रहने दो वरना ऐसी नज़दीकियां इनका कोई मुस्तक़बिल नहीं सिर्फ़ सूरत ही सूरत है सीरत का नामो निशान नहीं मन से हारना तो मैंने कभी सीखा ही नहीं और कहा हमेशा मजबूती से एकला चालो रे..... तुम भी स...

हुजूमे दुश्मना

इक हुजूमे-ए-दुश्मनां, सामने है रायगां, इक मुहब्बत के लिए !! किस क़दर हैं बदगुमां, ज़ीस्त जिसने दी मुझे, वो ही देगा सायबां, खुद-ब-खुद करना सभी, कौन किसपे मेहरबां, वक़्त देखा बदतरीन, था सभी कुछ तो निहां....   किसलिए हो फ़िक्र तब, ये बताओ जान-ए-जां, उर्मिला माधव.... 26.10.2014...

वा करूं मैं

आसमां पै रास्ता अब वा करूँ मैं ? या नई दुनियां कोई पैदा करूँ मैं ? जब ख़ुदा भी हाथ में खंज़र लिए हो, कौनसे दर पै भला सजदा करूँ मैं ? हर शिकायत आपको ज़ाहिर तो की है, और अब किस ढंग से शिकवा करूँ मैं? जल रही हैं,आग की लपटें....धकाधक, किस तरह बचके कहाँ निकला करूँ मैं, अश्क बे-गैरत है,इनकी ख़्वाहिशें भी  साथ इनके उम्र भर.......रोया करूं मैं, दिल्लगी भी कम नहीं की है जहां ने, क्या यही लाज़िम था के देखा करूं मैं, तीरगी तक़दीर में अव्वल लिखी है, चांदनी रातों को क्यूँ रुसवा करूं मैं... जिसको देखो दुश्मनी के रंग में है, ज़िन्दगी तू ही बता दे क्या करूँ मैं ?. उर्मिला माधव... 26.10 2014...

बाबा की बैठक

सहेलियों, आगे बाद में 😢 बाबा की बैठक, अम्मा की रसोई, बाबुल की देहरी, सब में एक आड़ होगई, वो देहरी पहाड़ होगई, घर का वो जीना, चढ़ें आवै न पसीना हर इक महीना जैसे, सावन का महीना, सब में एक आड़ होगई, वो देहरी पहाड़ हो गई, सांझ भई आंगन में, खटिया बिछा बिटिया, नानी बगल जाकें, पानी की रख लुटिया, सब में एक आड़ होगई, वो देहरी पहाड़ हो गई, सूनी दुपहरिया में, गलियों के कई चक्कर, भैया से मुठभेड़, होनी ही थी टक्कर,  सब में एक आड़ हो गई, वो देहरी पहाड़ हो गई, चुन्नी की दुनियां में  फ़्रॉक हो गई हवा, यौवन की देहरी पे, चुन्नी ही थी गवा(ह), सब में एक आड़ हो गई, वो देहरी पहाड़ हो गई, गलियों पे पाबंदी, हंसने पे पाबंदी, गाने पे पाबन्दी, नस-नस पे पाबंदी, पर सब पे आड़ हो गई, वो देहरी पहाड़ हो गई, उर्मिला माधव, 26.10.2017

हरी हुई थी

दिलों में नफ़रत भरी हुई थी, मैं दुश्मनों से डरी हुई थी, यही समझने में दिन गए सब, के चोट फिर से हरी हुई थी, जिसे ख़ुशी हम समझ रहे थे, वो जाने कब की मरी हुई थी, नहीं असीरी,मुझे मुआफ़िक, मैं अपनी ज़िद से बरी हुई थी, वो अपनी दुनियां बचा रही हूँ, जो मुश्किलों से खरी हुई थी, उर्मिला माधव,

तक़लीफ़ हुई थी। फ्री वर्स

तक़लीफ़ हुई थी, जब तुम पहली बार रूड बोले थे, ताज्जुब हुआ था, जब प्रतिउत्तर में तुम झूठ बोले थे, तुम ये समझे,मैंने मान लिया था, पर नहीं समझे तो बस इतना, कि मैंने सब कुछ जान लिया था , परदे के पीछे का सच, वो आधार हीन खीझ, जो तुमने मुझ पर उतारी थी, तुम ये भूल गए थे, मैंने तो ये ज़िन्दगी पहले भी, कई बार हारी थी, सदमे नहीं लगते अब, किसी भी सूरत में, क्यूंकि, मिलने से पहले मैं स्वयं ही बिछुड़ जाती हूँ, फिर उसी गली को मुड़ जाती हूँ, और अपने अतीत से जुड़ जाती हूँ, कभी-कभी सोचती हूँ, तुम्हारे कहे शब्द, मैं हमेशा,साथ नहीं हो सकता, और तुम साथ नहीं हुए, तो क्या मैं चली नहीं? ये क्रम है,मेरे जीवन का, हार-जीत से परे, कोई फ़र्क नहीं,  किसी उपेक्षा से, तुम तो पहले भी नहीं थे, तुमसे मिलने को, क्या अकेली नहीं आई थी? अकेले सफ़र की शुरुआत, नहीं की थी ? अरे..!! जो हार से ही शुरू हुआ हो, उसे क्या अंतर होगा ? अब हार पहना दो, या हार मनवा लो, एक ही तो बात हुई न, उर्मिला माधव... 23.10.2016

शीशे में बाल आया हुआ

जा नहीं सकता कभी शीशे में बाल आया हुआ, दिल भुला देगा कभी उनका ख़याल आया हुआ जाने किस-किस शक्ल से उठती रही हैं उँगलियाँ, जैसे मेरी सादगी पर ....हो सवाल आया हुआ, ग़म शनासी की तलब करती नहीं बेचैन अब, देख लीजे ज़िन्दगी में है कमाल आया हुआ, कुछ लकीरों में रहेंगी खामियां तकदीर की, आसमां देखेगा बस दिल पर मलाल आया हुआ उर्मिला माधव

अदा कहिए

ये एक फिल्बदी के तहत है... ------------------------------------- उसके इनकार को अदा कहिये, दौर-ए-मुश्किल में और क्या कहिये, आगे नज़रों के जो भी आजाये, बा-अदब उसको ना खुदा कहिये, ज़िन्दगी जिस तरह भी चलती हो, शुक्रिया उसको बा दुआ कहिये , धडकनें दिल की साथ उड़ लेंगी, जश्न-ए-दौरां में बस हवा कहिये, दिल पै कितना ही कुछ गुज़रता हो, उसको हरगिज़ न बे-वफ़ा कहिये  उर्मिला माधव... 19.10 2014...
तुमने उस ज़ख़्म से कुछ नम तो निचोड़ा होगा, अब ये बतलाओ उसे किस हाल में छोड़ा होगा। उसके रिसने की कोई ख़ास थी रफ़्तार कहीं? तब ये समझो कि वहीं दर्द भी थोड़ा होगा,

उखड़ जाती है

जब किसी क़ब्र से कोई ईंट उखड जाती है, घर की दीवार से कुछ राख़ सी झड़ जाती है, दश्त-ए-खुर्शीद से उतरी सी कोई बेचैनी , लम्बे अरसे के लिए ग़म से जकड़ जाती है, छोड़ती जाती है मेरे आगे कोई वीराना, ग़म ज़दा करके मेरे पीछे ही पड़ जाती है,  ऐसा लगता है हर इक ज़ात से हूँ वाबस्ता, वरना क्या चीज़ है जो रूह में गड़ जाती है  उर्मिला माधव  17.10.2017

ज़िन्दगी धोका न खाना

मैं तुम्हें भी छोड़ दूँगी,ज़िन्दगी धोका न खाना, चाहे कुछ कहती रहूँ मैं..मेरी बातों मैं न आना, देखते ही देखते मैं अलविदा कह दूंगी तुमको, भूल जाओगी हमेशा के लिए तुम आना-जाना, चंद साँसों के लिए अहसान सा करती रही हो, तुम बताओ देख पाया कौन ये सपना सुहाना? लोग आपस मैं मुहब्बत करते हैं वादों के साथ, उनके होठों से हमेशा...छीनती तुम मुस्कुराना, इसलिए कहती हूँ तुमसे,छोड़ दो जलवे दिखाना, सिर्फ तुम दुश्मन जहाँ मैं,जानता सारा ज़माना... उर्मिला माधव... 13.10.2013...

फ्री वर्स ..,भीड़ नहीं हो

प्रियवर--- तुम भीड़ नहीं हो भीड़ में कुछ आँखें बहुत चुभती हैं मुझे तुम जानते हो क्या कहती हूँ मैं भीड़ की आँखों की चुभन सालती है मुझे तुम जानते हो क्या कहती हूँ मैं तुम्हारा भीड़ से बचे रहना बहुत ज़रूरी है खो जाओगे तुम, ऐसा नहीं है तुम्हें भीड़ पसंद जो नहीं तुम जानते हो क्या कहती हूँ मैं ये अच्छा है,तुम सहल नहीं हो, वरना किसीसे भी हल हो जाते, ऊपर से कुछ भी हो सकते हो पर तुमको हल करना सहल नहीं तुम जानते हो क्या कहती हूँ मैं मैंने जानी है तुम्हारी दुनियां भीड़ क्या जाने तुम सहल नहीं हो बीते हुए पल नहीं हो तुम तत्काल हो,यहीं हो तुम जानते हो क्या कहती हूँ मैं ऊपरी आवरण तुम्हें  आकर्षित कर सकते हैं कुछ देर को  स्थायित्व नहीं पा सकती भीड़ तुम्हारी आँखों में क्योंकि तुम सहल नहीं हो तुम जानते ही हो क्या कहती हूँ मैं  प्रियवर... #उर्मिलामाधव 13.10.2015..

याद क्या करना ग़मों का

याद क्या करना ग़मों का, आते-जाते ...मौसमों का, ख़ैर मक़दम ही किया है, ज़ह्र से उन आलमों का, क्यूं रहे शिकवा किसीसे, उम्र भर के मातमों का, डर कहां बाक़ी रहा अब, गोलियों का और बमों का सामना करते रहे जब, कैसे-कैसे रुस्तमों का, उर्मिला माधव, 13.10.2017

शर्मिंदगी है

क्या बची आँखों में कुछ शर्मिंदगी है? या अभी तक भी मुसलसल गंदगी है? आग दरया में लगा कर क्या करोगे? जिसकी फितरत ही सरासर बंदगी है, दिल हमारा खूब दरया है अभी तक,   इसलिए महफ़ूज़ अपनी ज़िन्दगी है...... उर्मिला माधव...

हम भी करके देखते हैं

फिर से हिफ़्ज़े आबरू अब हम भी करके देखते हैं, ख़ुद के ही खूं से वज़ू अब हम भी करके देखते हैं, आदमी का क़द गिरा तो कितना छोटा हो गया, फ़िर से इसको ख़ूबरु अब हम भी करके देखते हैं, सोचते हैं अपने दिल का ढूंढ लें कोई बदल, इक ज़रा सी जुस्तजू अब हम भी करके देखते हैं, लोग कहते हैं यहां पर इश्क़ करना है सवाब, दिल बुरीदह सुर्ख़रू अब हम भी करके देखते हैं, उर्मिला माधव

वो लिखा जाए

उसने चाहा था वो लिखा जाये, इससे बेहतर है ....मर्सिया गाये दिल मगर इन्तिख़ाब करता है अब किसीसे न कुछ कहा जाये झूठ से पुर असर तबस्सुम क्या, इब्न-ए-आदम पै हर गिला जाए, किसकी अब बानगी तलाशे दिल, ख़ाक़ दरिया में जब बहा आये, अब ये तबियत कहीं नहीं लगती, इस तरह कब तलक चला जाए, अपनी मुठ्ठी में ख़ाक़ रखते हैं, ज़िन्दगी तुझसे क्या मिला जाए.. #उर्मिलामाधव 11.10.2015

जब हमने बज़्म में

जब हमने बज़्म में देखा जो उसको आते हुए, किया है प्यार का दावा भी मुस्कराते हुए, वफ़ा का तज़किरा जब भी किसीने छेड़ा है, हमें भी अच्छा लगा उसकी सम्त जाते हुए, हम अपनी बात को कहते हैं अपनी तौर महज़, ज़माना हंसता रहा हमको जब सताते हुए, हमारी जान कहीं अब भी उसमें पिन्हा है, तो फिर न रंज हुआ उसका ग़म निभाते हुए, उर्मिला माधव

लाहौर वाले

याद तुमको कर रही हूँ, अय मियां लाहौर वाले, आज तक भी सब खड़े हैं, दरमियां लाहौर वाले, तुमने लानत भेज दी जब ज़िन्दग़ी को हार कर, अब भला किस काम की ये अदवियां लाहौर वाले, अब न तुम ही हो न कोई भी महकती शाम है, खोल दें या बंद रख्खें, खिड़कियां लाहौर वाले तुम तो ये कहते थे कि रोना नहीं है आपको, क्या कहीं से सुन रहे हो, हिचकियां लाहौर वाले

हसीन देखा

पहले से ख़्वाब हमने ज़्यादा हसीन देखा, जब धड़कनों को अपनी ताज़ा तरीन देखा, मुश्किल हुआ समझना,क्या ज़ेहन में लिखा है, जब शख्सियत को इतना ज़्यादः ज़हीन देखा, बारीकियां समझना,आसान तो नहीं था, जिस्म-ओ- जिगर पे होता चर्चा महीन देखा, कुछ अहमियत न देखी जज़्बात की जहां में, हर लम्हा ज़िन्दगी को ,ऐसी मशीन देखा, हैरत में हर कोई था ये देख कर यक़ायक, मेहताब को ज़मी पर, परदा नशीन देखा, उर्मिला माधव,

कर रख्खा है

राहत इंदौरी जी के एक मिसरे से इंस्पायर्ड.. दाद लोगों की, गला अपना, ग़ज़ल उस्ताद की उस्तादों ने काम भला कर रख्खा है, सबने उनके नाम गला कर रख्खा है। शायर भी कहलाना छोटी बात नहीं, रबने सब का काम चला कर रख्खा है। क़लम चलाना ग़ैर ज़रूरी बात सही, मौसिक़ी ने बाम पे लाकर रख्खा है। उर्मिला माधव

कबकी चली हो वैसे

हाथों से जोड़ते हैं, हम ज़िन्दगी को ऐसे, रेशम की डोरियों से, रस्सा कशी हो जैसे, ये सोचते थे आख़िर,किस्सा तो ख़त्म होगा, इस मोड़ पे कहानी रुक भी गई, तो कैसे, सीखा है ज़िन्दगी से, ख़ामोशियों में जलना, और ज़िन्दगी धुआं बन, उड़ती रही हो नै से, इक शोर उठ रहा है, रौशन शमअ भी होगी, ऐ रौशनी बताओ, कब की चली हो वैसे? उर्मिला माधव

बज़्म में देखा

जब हमने बज़्म में देखा जो उसको आते हुए, किया है प्यार का दावा भी मुस्कराते हुए, वफ़ा का तज़किरा जब भी किसीने छेड़ा है, हमें भी अच्छा लगा उसकी सम्त जाते हुए, हम अपनी बात को कहते हैं अपनी तौर महज़, ज़माना हंसता रहा हमको जब सताते हुए, हमारी जान कहीं अब भी उसमें पिन्हा है, तो फिर न रंज हुआ उसका ग़म निभाते हुए, उर्मिला माधव

कुछ शेर

अब कहीं खुशबुएं नहीं आतीं, आग के बीच में है घर अपना, बंद आंखों में दम निकल जाए, आंख खोलें तो ख़ाब ढल जाए, अब कहीं ज़िन्दगी नहीं मिलती, जो भी मिलता है जाने क्या है वो.. उर्मिला माधव

बक-बक करते रहते हैं

क्या जाने क्या बक बक करते रहते हैं, मर जाने की हद तक करते रहते हैं.. लानत भिजवाना भी ज़िम्मेदारी है, जो कुछ भी है, अनथक करते रहते हैं.. इनको इतना वक़्त कहां से मिलता है, जिस्म से ले के मन तक करते रहते हैं.. उर्मिला माधव

ख़ाब घेरे हैं

बस ये समझा कि आप मेरे हैं, क्या ख़बर थी कि ख़ाब घेरे हैं,

जिसका मुझको ज्ञान नहीं है

जिसका मुझको ज्ञान नहीं है, वो मुझको ...आसान नहीं है.. ऐसा शब्द कभी ना बोलें, जिसका कोई भान नहीं है.. शब्दों में कुछ लिख कर पाना, किंचित भी सम्मान नहीं है.. सूर्य उगा और अस्त हो गया, मात्र वही दिनमान नहीं है.. उड़ता हो उपहास तुम्हारा, वो सुख में व्यवधान नहीं है.. चलते चलते थक जाना ही, जीवन का अवसान नहीं है.. उर्मिला माधव

घर आखिर

शौक़ हो भी तो किस क़दर आख़िर, क्योकि छूटेगा हम से घर आख़िर, झुक ही जाना है जब ये सर आख़िर

हमतो कितनी बार गए हैं

हम तो कितनी बार गए हैं, उसके घर के दरवाज़े तक, वो ही कभी न आया फिर के अपने किये हुए वादे तक.. दर्द में पिन्हा होकर भी बस खामोशी से देखा सब कुछ, ख़ुद को हमने क़सम दिलाई, नहीं टूटना ग़म साधे तक.. उर्मिला माधव

पुकार लें

ये वक़्त वो नहीं है जिसे फिर पुकार लें, अब ज़िन्दगी जहां है, वहीं पर गुज़ार लें.. दुनिया से रस्म राह किसे हो सकी नसीब, हिम्मत जुटा रहे हैं कभी ख़ुद से हार लें.. उर्मिला माधव

बहाना चाहती हूँ

सिर्फ़ हंसने को बहाना चाहती हूँ, मैं कहाँ सबको हंसाना चाहती हूँ, गर उमड़ आए समंदर अश्क़ का, तब मैं तनहाई में जाना चाहती हूँ, ग़ैर के कांधे की तालिब किसलिए, बार अपना ख़ुद उठाना चाहती हूँ, मैंने कब साझा किया है ग़म कहीं, राह अपनी ख़ुद बनाना चाहती हूँ, कोई हँस के बोल ले तो ठीक है, वर्ना घर को लौट जाना चाहती हूँ.. हर हक़ीक़त जानती हूँ दह्र की, इसलिए दामन बचाना चाहती हूँ, उर्मिला माधव 23.1.2018

फ़साना न आया

हमें तो जगह भी बनाना न आया, कभी पास अपने ज़माना न आया. ज़माने की रस्मों से लड़ते रहे हम, मगर जान अपनी बचाना न आया.. हज़ारों की हम दास्तां सुन रहे थे, कहीं भी हमारा फ़साना न आया. हमें ज़ख़्म अपने छुपाना न आया

ख़ाक हो कर

हम यहां जीते रहे हैं ख़ाक होकर, पर हमेशा ख़ुश रहे ग़मनाक होकर बोझ ग़म का हम समेटे आ गए अब, लौट जाएंगे यहां से चाक हो कर उर्मिला माधव

उदास रह गया

ग़म हमारी ज़िंदगी के आस-पास रह गया, बस लबों से हंस दिए, दिल उदास रह गया। मुश्किलें थी और सिर्फ़ दर्द की बाबस्तगी, कौन अपनी ज़िंदगी में ग़म शनास रह गया। आह,चीख़ रंजो ग़म, बर्फ़ हो के जम गए, जिस्म गल के गिर गया है बस लिबास रह गया। उर्मिला माधव