गिला ही क्यों हो

पुराने पन्नों से----!!
------------------!!
हमें किसीसे गिला ही क्यूँ हो ??
जिसे जो कहना हो कहले आके,

कि जिस चलन से निबाहीं हमने,
कभी तो कोई यूँ सहले आके,

जिसे हो दावा बुलन्दियों का,
कटा ले गरदन वो पहले आके,

न कुछ नुमायाँ सिवाय वहशत,
है कोई इस घर में रहले आके??

यूँ एक गुँचा फफक के रोया,
क्यूँ लोग गुलशन में टहले आके??

हमारे हाथों में दम कहाँ कुछ ??
जो कोई चाहे वो बहले आके.....
उर्मिला माधव..
२७.१०.२०१३..

Comments

Popular posts from this blog

गरां दिल पे गुज़रा है गुज़रा ज़माना

kab chal paoge