वा करूं मैं

आसमां पै रास्ता अब वा करूँ मैं ?
या नई दुनियां कोई पैदा करूँ मैं ?

जब ख़ुदा भी हाथ में खंज़र लिए हो,
कौनसे दर पै भला सजदा करूँ मैं ?

हर शिकायत आपको ज़ाहिर तो की है,
और अब किस ढंग से शिकवा करूँ मैं?

जल रही हैं,आग की लपटें....धकाधक,
किस तरह बचके कहाँ निकला करूँ मैं,

अश्क बे-गैरत है,इनकी ख़्वाहिशें भी 
साथ इनके उम्र भर.......रोया करूं मैं,

दिल्लगी भी कम नहीं की है जहां ने,
क्या यही लाज़िम था के देखा करूं मैं,

तीरगी तक़दीर में अव्वल लिखी है,
चांदनी रातों को क्यूँ रुसवा करूं मैं...

जिसको देखो दुश्मनी के रंग में है,
ज़िन्दगी तू ही बता दे क्या करूँ मैं ?.

उर्मिला माधव...
26.10 2014...

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