उखड़ जाती है

जब किसी क़ब्र से कोई ईंट उखड जाती है,
घर की दीवार से कुछ राख़ सी झड़ जाती है,

दश्त-ए-खुर्शीद से उतरी सी कोई बेचैनी ,
लम्बे अरसे के लिए ग़म से जकड़ जाती है,

छोड़ती जाती है मेरे आगे कोई वीराना,
ग़म ज़दा करके मेरे पीछे ही पड़ जाती है, 

ऐसा लगता है हर इक ज़ात से हूँ वाबस्ता,
वरना क्या चीज़ है जो रूह में गड़ जाती है 
उर्मिला माधव 
17.10.2017

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