फ़साना न आया

हमें तो जगह भी बनाना न आया,
कभी पास अपने ज़माना न आया.

ज़माने की रस्मों से लड़ते रहे हम,
मगर जान अपनी बचाना न आया..

हज़ारों की हम दास्तां सुन रहे थे,
कहीं भी हमारा फ़साना न आया.

हमें ज़ख़्म अपने छुपाना न आया

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