कबकी चली हो वैसे
हाथों से जोड़ते हैं, हम ज़िन्दगी को ऐसे,
रेशम की डोरियों से, रस्सा कशी हो जैसे,
ये सोचते थे आख़िर,किस्सा तो ख़त्म होगा,
इस मोड़ पे कहानी रुक भी गई, तो कैसे,
सीखा है ज़िन्दगी से, ख़ामोशियों में जलना,
और ज़िन्दगी धुआं बन, उड़ती रही हो नै से,
इक शोर उठ रहा है, रौशन शमअ भी होगी,
ऐ रौशनी बताओ, कब की चली हो वैसे?
उर्मिला माधव
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