हरी हुई थी
दिलों में नफ़रत भरी हुई थी,
मैं दुश्मनों से डरी हुई थी,
यही समझने में दिन गए सब,
के चोट फिर से हरी हुई थी,
जिसे ख़ुशी हम समझ रहे थे,
वो जाने कब की मरी हुई थी,
नहीं असीरी,मुझे मुआफ़िक,
मैं अपनी ज़िद से बरी हुई थी,
वो अपनी दुनियां बचा रही हूँ,
जो मुश्किलों से खरी हुई थी,
उर्मिला माधव,
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