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Showing posts from April, 2020

वास्ता

उम्र भर हमको रहा है तल्ख़ियत से वास्ता, ढूँढते ही हम नहीं अब और कोई रास्ता ..Urmila Madhav. 30.4.2013 तल्ख़ियत---कड़वाहट

पानी पानी

कुछ दोस्तों ने हमको,बख्शी है नातवानी, दिल को हुई नसीहत,आँखें हैं,पानी-पानी.... उर्मिला माधव... 30.4.2014...

सागर पार तुझको

सुन हवा चलते हुए जाना है सागर पार तुझको बस उसी खुश्बू में मिल जायेगा मेरा प्यार तुझको पूछना उनसे कभी कोई याद भी आता है उनको, क्या कोई दिल की छुपी रूदाद दिखलाता है उनको, और वहां बारिश का मौसम भी कभी आता तो होगा, जाने अनजाने सही पर दिल को धड़काता  तो होगा, बिजलियाँ घर की मुंडेरों पर अगर चमकीं कभी जब, क्या उन्हें मालूम है के कोई डरता है कहीं तब ? ये अजब इक दास्ताँ है तुझको बतलाती हूँ सुन ले, ये तो क़ुदरत का करिश्मा है जिसे चाहे वो चुन ले, #उर्मिलामाधव... 30.4.2015..

अहले करम

जिस्म-ओ-जां दुश्वारियों से थक रहे हैं दम-ब-दम, सांस लेने की भी मोहलत कब मिली अहले करम ? तीर -ओ-खंजर से भी क्या डरना बता ऐ ज़िंदगी, बस यही असबाब तो अपने रहे हैं हम क़दम, हौसले कब पस्त हैं,सेहरा की जद को तोड़ कर, बस हवा दरकार थी,रेग-ए-तपां में कम से कम, लोग कहते हैं सुख़नवर,लीक पर चलते नहीं, सोचते हैं इसकी इज़्ज़त बा अदब रख्खेंगे हम, अपने ही अंदाज़ में जीना गवारा है हमें, हो रहे तूफान बरपा या के हो रंज-ओ-अलम... जब जहाँ तबियत हुई सजदा किया हमने वहीँ, कौन इतना फ़र्क़ करता, घर है या दैर-ओ-हरम, उर्मिला माधव, 30.4.2016

रूठ जाते हैं

ऐसा करते हैं,रूठ जाते हैं, ज़िन्दगी भर को छूट जाते हैं... कब तलक आपको पुकारें हम, इतना थकते हैं टूट जाते हैं.. दिल को थामे हैं दोनों हाथों से, आबले फिर भी फूट जाते हैं.. दिल पे पहले ही से ग़रीबी है, लोग ..रह रह के लूट जाते हैं, दिल ने हमको रुलाके तोड़ा है, इसको हाथों से कूट जाते हैं, उर्मिला माधव... 30.4.2017

नमी न रही

ख़ुश्क आंखों में जब नमी न रही, ज़िन्दगी फ़िर ये ज़िन्दगी न रही, जब बड़े हादसों की ज़द में रहे, ज़ब्त की फ़िर कहीं कमी न रही, हमको तनहाई ने संभाला बहुत, तीरगी तुझ से बरहमी न रही, खिड़कियां धुल गईं जो बारिश में, गर्द  फ़िर देर तक जमी न रही... उर्मिला माधव, 30.4.2018

आते रहे

इस क़दर संजीदगी से पेश वो आते रहे, होगए गाफ़िल फ़रेब-ए ज़ीस्त हम खाते रहे, उनकी फ़ितरत में तग़ाफ़ुल का चलन कुछ ख़ास था, ख़ामियों को ख़ूबियों के साथ दिखलाते रहे, अपने दिल को हमने ऐसा बदग़ुमाँ रहने दिया, उनके सुर में सुर मिलाके गीत हम गाते रहे, अपनी रुसवाई का चर्चा आम हो जाने दिया, लोग जो कहते रहे हम सुनके शर्माते रहे, अपने जीने का तरीका,अपना ना रहने दिया, जो भी वो कहते रहे,हम वो ही दोहराते रहे।।...Urmila Madhav 29.4.2013

छुपाई हमने

मैं अश्कबर हूँ ना कोई देखे, यूँ रुख़ पे चिलमन गिराई हमने, न कोई आहों का दर्द जाने, यूँ बात हँसके छुपाई हमने। हमें मुहब्बत थी आँधियों से, तो कैसे तूफ़ाँ से बच निकलते, कि अपने जज़्बों पै धूल रखके, ये शम्मे महफ़िल सजाई हमने। वो संगदिल थे ये मेरी किस्मत, तो फ़िर ज़माने को क्या बताते, सिसक रहे हैं यूँ दिल ही दिल में, ये बात सबसे छुपाई हमने ।।..... .उर्मिला माधव.. 28.2.2013

मनोव्यथा ---नज़्म

सड़क पर रहने वाले युवक की मनोव्यथा----- ------------------------------------------------------- अनुष्ठान जब कोई होता, मेरा मन भीतर से रोता , मेरे पास कमीज़ नहीं थी, कोई मुझे तमीज नहीं थी, कहीं अगर जो बाजे बजते , मेरे ख्वाब चौगुने सजते, मन पंछी तब खूब उछलता, जाने को ये खूब मचलता, कोई मुझको नहीं बुलाता, कन्नी काट बगल हो जाता, मेरी कोइ दहलीज़ नहीं थी, मेरे पास कमीज़ नहीं थी, तनहाई में सोचा करता, बिना विचारे क्यूँ नईं सरता? मुझमें दया भाव नईं शायद , बे-मतलब की करूँ कवायद , मेरा वतन गरीब बहुत है, सबका दर्द करीब बहुत है, यह सब कोई चीज़ नहीं है मेरे पास कमीज़ नहीं है, अच्छे दिन आने वाले हैं, बुरे सहज जाने वाले हैं, ये सुन कर मैं हंस लेता था, जो मिल जाए रख लेता था, ऐसा अगर कहीं हो जाए, दिल को ज़रा समझ हो जाए, मेरा कोई हफीज नहीं है, मेरे पास कमीज़ नहीं है... उर्मिला माधव... 29.4.2014...

पता तो करो

किसने भेजा है ये पयाम कुछ पता तो करो, क्या है इलज़ाम मेरे नाम कुछ पता तो करो, शह्र में किस तरह का शोर आज बरपा है' सबका है सब्र क्यूं तमाम कुछ पता तो करो... चार सम्तों में इक नफ़स को जगह है के नहीं, और क्या क्या है इंतज़ाम कुछ पता तो करो. ख़ून के रंग में अब रंगी सी लगे रंग ए हिना, किस तरह का है इंतक़ाम कुछ पता तो करो. क्यों हवाओं में रंग शामिल है अब सियासत का, और किस किस का है ये काम कुछ पता तो करो #उर्मिलामाधव 29.4.2015..

बाक़ी हैं

पहले ही सब निशान बाक़ी हैं, फिर नए इम्तिहान बाकी हैं....। #उर्मिला

बीनाई

आँख है पर क्या करें बीनाई तो पायी नहीं, बात बढ़के हसरत-ए-दीदार तक आई नहीं, आँख से परदे हटाके,दिल की जानिब देखले, इस तरह गर्दन झुकानी क्यूँ तुझे आई नहीं?? तार दामन के बचाता है अबस ही बे खबर, इश्क़ में दीवाना होना....कोई रुसवाई नहीं, जो तू मिलना चाहता है,दिलनशीं महबूब से, सर झुका कुर्बान होजा.....वरना शैदाई नहीं, है अनल-हक़ देख तो नज़रें घुमा कर चार सू ये जो अनहद बज रहा है क्या वो शहनाई नहीं? उर्मिला माधव... 29.4.2016

दुखाता रहेगा

अगर इस क़दर दिल दुखाता रहेगा, यक़ीनन ही बस आता-जाता रहेगा, तवज्जो को जाने न जाने तगाफ़ुल, फ़क़त दीदा-ए- तर दिखाता रहेगा  भटकती फ़ज़ाओं की तनहाइयों में  जबीं कोई कब तक झुकाता रहेगा, अजब खेल देखा ज़माने में दिल का, जो ठुकरा दे उस पर ही आता रहेगा, जहां पर कभी कोई इज्ज़त न पायी, उसी दर पे रह-रह के जाता रहेगा, उर्मिला माधव ... 29.4.2017.

संभाला हमने

उम्र भर साख़ ओ ईमान संभाला हमने, ख़ुद को कोने में कहीं, जान के डाला हमने, जिसको देखो वो गुनहगार कहे जाता था, दिल के दुखने को बड़ी देर तक टाला हमने, उर्मिला माधव

आज़माता ही रहे

कब तलक कोई किसीको आज़माता ही रहे ? मोल अपनी चाहतों का क्यूँ चुकाता ही रहे ?? शख़्सियत अपनी मिटाकर बेवजह सजदे करे, क्यूँ किन्हीं क़दमों में कोई सर झुकाता ही रहे ?....Urmila Madhav 28.4.2013

सम्हाली है

ज़िन्दगी इस तरह सम्हाली है, पिछली यादों पै ख़ाक डाली है, अपनी आहों पै इख़्तियार रखा, कुछ न कहने की क़सम खाली है, जिससे दिलने गिला किया ही नहीं, उससे फिर रूह क्यूँ सवाली है?? अपने चेहरे की धूल देखी नहीं, बात मजलिस में क्यूँ उछाली है??.. Urmila Madhav 28.4.2013

दुखाता रहेगा

अगर इस क़दर दिल दुखाता रहेगा, यक़ीनन ही बस आता-जाता रहेगा, तवज्जो को जाने न जाने तगाफ़ुल, फ़क़त दीदा-ए- तर दिखाता रहेगा  भटकती फ़ज़ाओं की तनहाइयों में  जबीं कोई कब तक झुकाता रहेगा, अजब खेल देखा ज़माने में दिल का, जो ठुकरा दे उस पर ही आता रहेगा, जहां पर कभी कोई इज्ज़त न पायी, उसी दर पे रह-रह के जाता रहेगा, उर्मिला माधव ... 28.4.2014...

पूछ तो ले

उफ़ शबे ग़म क्या बला है पूछ तो ले, कौन कब कितना जला है, पूछ तो ले, तेरे लफ़्ज़ों में हमेशा तंज़ ही क्यों, कब से दिल में ग़म पला है पूछ तो ले ख़ून छालों से रिसा ऑ चल रहा है, किस तरह इतना चला है पूछ तो ले, आह भर के भी महज़ ख़ामोश ही है, ज़ीस्त उसकी क्यों ख़ला है पूछ तो ले, क्या गमों से सिलसिला है पूछ तो ले, उर्मिला माधव 9.2.2018

ज़माना ख़राब है

तिरछी अदा से बात का कहना सवाब है, कुछ भी नहीं है सह्ल ज़माना ख़राब है, बच बच के चल रहे हो, कहाँ बच सके मगर, बेआबरू खड़े हो, यही इक जवाब है, जिस राह पर चले हैं तहम्मुल से आज तक, एहसास हो गया है यहीं इज़्तिराब है, जब तुन्द आंधियों से कभी हम नहीं डरे, सरमाया ज़िन्दगी का मगर, आब आब है, उनको गुमान  तिफ़्ल हमें जानते हैं वो, दिल में हसद है मुंह पे बहुत जी जनाब है, हम मुस्तहक थे फिर भी कभी कुछ नहीं कहा, अपना वजूद उनको फ़क़त  इक हबाब है, उर्मिला माधव

दर्द ढोते थे

पहले क्या-क्या न दर्द ढोते थे, ख़ूब हम दिल ही दिल में रोते थे, जाने कितनी अदाएं,देखी हैं, लोग भी क्या टशन में होते थे!! बात इतनी है अय जहां वालो, ग़लतियां सारी,हम ही बोते थे, चोट खाकर फ़िज़ूल बातों की, दिल ऑ दामन बहुत भिगोते थे, बेअसर है हर इक अदा अब तो, सोचते हैं के हम क्या होते थे !! फाइनल ये समझ में आया है, बात कुछ भी हो हम ही खोते थे... 😊 (खोते--गधे) उर्मिला माधव... 23.4.2016

पर्दादारी

ये तो बस अपनी पर्दा दारी है, तुमने क्या बात कब सँवारी है? हाल मेरा गैर से पूछा किए, वाह क्या ख़ूब ग़मग़ुसारी है ! तल्ख़ लहजे से बात करना ही, क्या मुहब्बत की आबशारी है? ऐसे शिकवे के कुछ नहीं मानी, जिसमें यकतरफ़ा बात जारी है, तुमको ख़ामोशिय़ाँ मुबारक़ हों, मुझको बस मेरी बेक़रारी है।... Urmila Madhav 22.4.2013

मरासिम तोड़कर

अब ज़मीं से आसमानों तक के रस्ते छोड़कर, हम चले आये हैं तुमसे सब मरासिम तोड़कर, चाह से और आह तक भी कर दिए हमने दफ़न,  चल नहीं सकते हैं हरगिज़ हम जहाँ की होड़ कर, तुमने बस इतना कहा था,छुपके ही मिलना कभी, तुमको देखा ही नहीं फिर आँख अपनी मोड़ कर  हम कलेजा साफ़ रख कर ही अबस तुमसे मिले, तुम हमेशा खुश रहे हो इसकी,उससे जोड़ कर ..... वक़्त ही तो है कभी ....उल्टा अगर ये हो गया, बैठ कर रोया करोगे,सर ख़ुद अपना फोड़ कर... #उर्मिलामाधव ... 22.4.2015

ख़ुद्दारी के दम पर

अपनी ख़ुद्दारी के दम पर जी रहे हैं। इस लिए हम ज़ह्र लाखों पी रहे हैं। बारहा होते मुख़ातिब ज़ख्म अक्सर हम मुसलसल साथ इसके ही रहे हैं। ये अनादारी है आदत के मुताबिक हम न ज़ाती रंग में तरही रहे हैं। आपसी रिश्ते निभाने के चलन में यों समझ लो एकदम सतही रहे हैं। जब जहाँ धोखा धड़ी का दौर आया इक निशाने इसके बस हम ही रहे हैं। Urmila Madhav... 22.4.2016

हाफ़िज़ निहां--- बेटू की ग़ज़ल

A poem by Madhuvan Rishiraj छोड़ कर मुझको यहाँ हो गए हाफ़िज़ निहाँ मैं बेअमाँ... मैं बेअमाँ... उनके गए... मैं बेअमाँ सब ख़ाक है उनके बिना अब वो कहाँ और मैं कहाँ कोई नहीं मेरा पासबाँ हैं हर तरफ़ खंजर सिना मैं बेअमाँ... मैं बेअमाँ... उनके गए... मैं बेअमाँ है हर तरफ रेग-ए-तपाँ हैं मौत की परछाइयाँ है मश्क को छूना मना अब कौन है मेरा यहां मैं बेअमाँ... मैं बेअमाँ... उनके गए... मैं बेअमाँ नाम उनका, ये ज़बाँ थे वो ही मेरे दो जहाँ था उनका चेहरा आईना राह-ए-मकान-ए-लामकाँ मैं बेअमाँ... मैं बेअमाँ... उनके गए... मैं बेअमाँ हर तरफ़ हैं आँधियाँ हैं रेत के झोंके रवाँ और चल रहा हूँ बेनिशाँ मैं नातवाँ, तश्नादहाँ मैं बेअमाँ... मैं बेअमाँ... उनके गए... मैं बेअमाँ -MR... Madhuvan Rishiraj

जानता है

पेचो ख़म गिनवा रहा है जुल्फ़  के जो वो हवा से काम लेना जानता है। उसकी महफ़िल में वफ़ा कुछ भी नहीं अब, जो वफ़ा का नाम लेना जानता  है। उर्मिला माधव

मिली जैसी दिखाई दे

सहर और शाम आपस में,मिली जैसी दिखाई दे, कि जैसी देखना चाहें..........नहीं वैसी दिखाई दे,  समझना ही पड़ेगा ये...भरम है आँख का शायद, कभी कैसी दिखाई दे........कभी कैसी दिखाई दे... उर्मिला माधव... 20.4.2014...

रु ब रु

ख़ूब रु  था रु-ब=रु, जाने क्या थी गुफ़्तगू, क्यूँ अजब सा है असर, मिट गई हर आरज़ू, ख़ाब हो या हो ख़याल, अब न कोई जुस्तजू , आँख ने चाहा जिसे, हर घड़ी ऑ कू-ब-कू, ज़िद हमारी सुन ज़रा , माहवश ऐ माहरू, तेरी दुनियां तू समझ, मेरी दुनियां,अल्ला हू, जिस्म-जां तनहा सही, और ग़म भी चार सू , मैं रहूँ बस मैं ही में, तू रहे बस तू ही तू ...... #उर्मिलामाधव ... 20.4 .2015

वो मुझको याद आता है

कड़े फिकरे कोई कह कर, चला जाता था जो अक्सर, तग़ाफ़ुल उसकी नज़रों में, कभी देखा था जो मैंने, वो मुझको याद आता है।। ज़मीं जब ज़ख़्म धोती थी, फ़लक़ रह-रह के रोता था , कहीं तन्हाई में जाकर, कोई दामन भिगोता था वो मुझको याद आता है।। कहीं पर माँ बिछुड़ जाना, न ये दुनियां समझ पाना, किसी बच्चे की आँखें थीं कहीं जब मुन्तज़िर माँ की, वो मुझको याद आता है।। कोई मय्यत के आगे बैठकर, रोया नहीं हरगिज़, मगर आरिज़ की सुर्खी, कह रही थी,हाल अश्कों का, वो मुझको याद आता है।। कोई मंज़िल न थी फिर भी, मुसलसल,चल रही थी मैं, निशां क़दमों के दुनियां को, नहीं दिखते थे,जाने क्यूँ, वो मुझको याद आता है।। उर्मिला माधव, 20.4.2016

ज़िन्दगी तरसती रही

सुकून-ए-दिल के लिए ज़िन्दगी तरसती रही, मगर ये सांप सी दुनियां के सिर्फ़ डसती रही, हमारी रूह ने देखा तो ख़्वाब शीरीं था, अजब अज़ाब रहा, ज़िन्दगी झुलसती रही, बड़े ही शौक़ से पहुंचे थे, बर्फ़ के घर में, मगर लगा के कहीं, आग सी बरसती रही, किसी भी शै को अगर दिल ने अपना मान लिया, उलट-पलट के वही, तंज़-ओ-तीर कसती रही, मुख़ालफ़त को बहुत दूर से सलाम किया बहुत कमाल वही साथ-साथ बसती रही, उर्मिला माधव, 20.4.2017

ज़ख़्म ताज़ा ही है

ज़ख़्म ताज़ा ही है, भरा तो नहीं, हादसा ये भी कुछ नया तो नहीं।  दिल को आदत है, याद रखने की, आपसे फिर भी कुछ कहा तो नहीं। चश्म-ए-गिरया ने आंख धो डाली, क्या हुआ इसमें कुछ गया तो नहीं। जो भी हो मुद्दआ तो ख़त्म हुआ, इसके आगे का सिलसिला तो नहीं।  आख़री वक़्त है, गिला क्यों हो ? हौसला अब भी है मरा तो नहीं।  उर्मिला माधव 7.12.2017

रात रानी

याद उनकी सताती रही रात भर, नींद आँखें चुराती रही रात भर, रूह बेचैन होकर भटकती रही, बेबसी दिल दुखाती रही रात भर, एक खुशबू का झोंका मुसलसल रहा, रात रानी रुलाती रही रात भर, #उर्मिलामाधव.. 19.4.2015....

रात भर

तरही ग़ज़ल ------------- एक चिलमन सरकती रही रात भर, आँख रह-रह के तकती रही रात भर, रात रानी की खुशबू में डूबा जिगर, सांस जिससे महकती रही रात भर, एक अन्देशा सताता रहा बस मुझे, ये पलक जो फड़कती रही रात भर, मेरी धड़कन ने मुझको परीशां रखा, हद से ज़ादा धडकती रही...रात भर, कोई आया-गया भी नहीं इस तरफ, रूह किसकी भटकती रही रात भर..... -------------------------------------------------- Ek chilman saraktii rahii raat bhar, Aankh rah-rahke taktii rahii raat bhar, Raat raanii kii khushboo main doobaa jigar, Saans jisse mahaktii rahii raat bhar Ek andeshaa sataataa rahaa raat bas mujhe, Ye palak jo fadaktii rahii raat bhar, Meri dhadkan ne mujhko pareeshaan rakhaa, Had se zyadah dhadaktii rahii raat bhar, Koii aayaa-gayaa bhii nahinn is taraf, Rooh kiskii bhataktii rahii raat bhar...... उर्मिला माधव... 1.12.2014...

तंग दिल

आज कल वो होगए हैं संग दिल, आदतन यूँ भी हैं वो कुछ तंग दिल, हम रक़ाबी में सजा कर ले गए , कितना सुंदर ख़ुशनुमाँ नौरंग दिल, इससे बढ़ कर बेरुख़ी होती भी क्या बा-अदब लौटा दिया बैरंग दिल, लौट कर उस दर पै अब न जायेंगे, खुद ही खुद से कर रहा है जंग दिल, इस क़दर ये आज मैला हो गया, क्या दिखाएँ उनको ये बदरंग दिल.... उर्मिला माधव.. 19.4.2015...

चरित्र का

अच्छे शब्दों का संयोजन, परिचय देता है चरित्र का, ओछे शब्दों के प्रयोग से, होता है अपमान मित्र का, वाणी है संस्कृति सभ्यता, दर्पण देश के मान चित्र का, उर्मिला माधव... 19.4.2016

पैदा हुई है

ख़ुश्क आंखों में ......नमी पैदा हुई है, एक चाहत आज तक भी छुइ-मुई है, इक मेरा ऐजाज़ था जो तू न समझा, अब तलक भी देख ....पर्दा-ए-दुई है, उर्मिला माधव, 18.4.2017

खा रहे हैं

कितनी छोटी उम्र में बहका रहे हैं, लोग बच्चों की जवानी खा रहे हैं, कौन कितनी दूर तक माहिर हुआ है, दूसरा पहलू फ़क़त दिखला रहे हैं.. कुर्सियों पै बैठकर ऊंचाइयों से , ज़िन्दगी का फ़लसफ़ा समझा रहे हैं, हाथ में बोतल है ऑ शामी क़बाब, भूख से लड़ने का गुर सिखला रहे हैं, बाँट कर हिस्से वतन के कर चुके जो, वाह..!! वन्दे-मातरम् भी ग़ा रहे हैं उर्मिला माधव... 19.4.2014...

सबब क्या है

बे-पनह हुस्न का सबब क्या है, किसको मालूम है के कब क्या है, इससे पहले भी कुछ रहा होगा, तू मगर देख ले के अब क्या है? साथ कौड़ी भी इक नहीं जानी, अब बता तेरा वो अरब क्या है? उर्मिला माधव

तुम भी रहोगे?

आओ क्या मेरी तरहा तुम भी रहोगे? मेरा वीराना कभी तुम भी सहोगे? अब मिरी तनहाइयों का ये है आलम, किस तरह जीती हूं ये तुम भी कहोगे, मेरी आंखों में समंदर है पता है ? बह अगर निकला तो फिर तुम भी बहोगे ? क्या ख़बर थी जिंदगी घबराएगी तब, साथ मेरे उस घड़ी तुम भी न होगे, मैं तो इक गिरती हुई दीवार सी हूं, जब कभी ढह जाउंगी तुम भी ढहोगे? उर्मिला माधव

क्या था

तुम अगर अच्छे बहुत होते तो क्या था? मेरे ग़म में मेरे संग रोते तो क्या था ?

थक गए हैं हम

इतना समझ रहे थे कि अब थक गए हैं हम, पर ज़िन्दगी की आख़री हद तक गए हैं हम, रुसवाइयों का शोर ही इस दर्ज़ा लद रहा क्यूं अजनबी से शह्र में नाहक गए हैं हम, हम अपने तौर पर तो बहुत चुप ही थे मगर, अंदाज़ा हो रहा था कि कुछ बक गए हैं हम, उर्मिला माधव

तक़लीफ़ दी सभी ने नज़्म

तकलीफ दी सभी ने.... बस ढंग मुख्तलिफ़ थे, ------------------------ कभी बज़्म में बुलाकर, कभी बज़्म से हटा कर... कभी आसमां दिखा कर, कभी मुंह के बल गिरा कर, कभी दिल से दिल मिला कर, कभी दिल से कुछ जुदा कर. कभी अंजुमन सजा कर, कभी आशियाँ जलाकर, कभी ज़ख्म फ़िर बढ़ा कर, कभी झूठ ही दुआ कर, कभी मुझसे रुख छुपा कर, कभी रुख नया दिखा कर, कभी खुद ही इब्तेदा कर, कभी खुद ही इन्तहा कर, कभी हाले दिल सुना कर, कभी चिलमनें गिरा कर, अच्छा चलो हटाओ, लानत नहीं किसी पर, अय मेरे दिल दुआ कर, बस शुक्रिया अदा कर बस शुक्रिया अदा कर... उर्मिला माधव... 14.4.2015

ख़ूबियाँ कोई नहीं

अहसास----- राह जो चलनी है इसमें खूबियाँ कोई नहीं, रूह-ए-खुद को छोड़ के वक़्त-ए-गिरां कोई नहीं, पथ्थरों के आदमी हैं और दहर जलता हुआ, चिलचिलाती धूप है ऑ आशियाँ कोई नहीं, और कितना आज़माना,जो हुआ वो खूब है, तुम वही हो,हम वही राज़-ए-निहां कोई नहीं, है नया कुछ भी नहीं क्यूं इस क़दर हैरां हुए, साथ चलने को हमारे ,अय मियाँ कोई नहीं, सामने मक़्तल हुआ लो फ़िक़्र से खारिज़ हुए बस यही रस्ता है...जिसके दरमियाँ कोई नहीं..... उर्मिला माधव, 7.10.2014

किसी सूरत

उसे हम बा-वफ़ा कहते, ठहर जाता किसी सूरत, जिसे अफ़लाक़ की दुनियां में उड़ना भा गया है अब परिंदा है तो उसके पंख भी थकने ही हैं इक दिन, समझता है उसे दुनियां से लड़ना आ गया है अब.. उर्मिला माधव 14.4.2018

ईमान से

सह्ल होकर हम मिले थे, आज के इनसान से, खौफ़ से पीछे हटे हम, सच है ये, ईमान से, अपना सच हाथों में लेकर, मर गए कितने शफ़ी, झूठ की बुनियाद के परचम खड़े हैं, शान से, ख़त्म होती ही नहीं,कितनी बड़ी तन्हाई है, ताकते रहते हैं दुनिया, हम महज़ नादान से, उर्मिला माधव 14.4.2019

ईमान से

सह्ल होकर हम मिले थे, आज के इनसान से, खौफ़ से पीछे हटे हम, सच है ये, ईमान से, अपना सच हाथों में लेकर, मर गए कितने शफ़ी, झूठ की बुनियाद के परचम खड़े हैं, शान से, ख़त्म होती ही नहीं,कितनी बड़ी तन्हाई है, ताकते रहते हैं दुनिया, हम महज़ नादान से, उर्मिला माधव 14.4.2019

हासिल न था

एक तो हरगिज़ हमें रहबर तलक़ हासिल न था, उस पै कुछ तेरा सहारा भी महे-क़ामिल न था, रात को एक बज़्म में शिरक़त हमारी थी ज़रूर, जाने क्यों ऐसा लगा के हम वहीँ थे,दिल न था, बारहा कई रंग हमसे,  ख़ूब टकराये ज़रूर जो बहुत दरक़ार था वो  ज़ाहिरे महफ़िल न था, दूर से खुश्बू सी हमको एक आती थी ज़रूर, जिसको हम देखा किये वो दिल तो था बिस्मिल न था... बज़्म थी रंगीं बहुत और रौनकें भी थीं ज़रूर, फिर भी कुछ तो ख़ास था जो उस जगह शामिल न था.... #उर्मिलामाधव...12.4.2015

ताब रखते हैं

हम तख़य्युल की ताब रखते हैं, अपने दिल में ही ख़ाब रखते हैं, ज़ख्म-ए-उल्फ़त के सब सवालों का, हर मुक़म्मल जवाब रखते हैं, दिल कभी टूट कर न रोये कहीं, क़तरा-क़तरा हिसाब रखते हैं.. मुसकराते हैं ज़ेरे लब हर दम, दिल में लाखों अज़ाब रखते हैं, ज़िन्दगी चूँकि तुझको जीना है, खुद ही खाना ख़राब रखते हैं, मौत दावा करेगी क्या हम पर, जिसको हम इन्तिख़ाब रखते हैं, उर्मिला माधव 10.4.2018

रोज़ अलग है

तू इक ख़ालिस दीवाना है, मेरी-तेरी सोच अलग है, अजब तमाशा लगे ज़माना फ़िर रस्तों का खोट अलग है, दुनिया से थक कर लौटी हूँ, सूने मन में ख़्वाब कहाँ, नहीं मुकम्मल मंज़र कोई, हंसना रोना रोज़ अलग है, नए हवादिस रोज़ गुज़रना, समझाना पड़ता है ख़ुद को, बेकस नज़रें सहम गई हैं, उसपे उड़ता होश अलग है, उर्मिला माधव 10.4.2019

जिगर की पीर से

"हम बँधे क्यूँ आज भी ज़ंजीर से, कौन वाक़िफ़ है जिगर की पीर से?, शोहदों के बेसबब जुमले सभी, चीर जाते हैं दिलों को तीर से, हक़ की आज़ादी कभी पाई नहीं आँख डरती ही रही शमशीर से, बदनीयत साजिश हज़ारों झेलकर, बुझ गया दिल फिर उसी तासीर से, रच गए इतिहास मुड़कर देखलो, पाँव बाहर रख दिया जो लकीर से ।। उर्मिला माधव...." 9.4.2013

जानते नहीं हम

किसका वक़ार क्या है,ये जानते नहीं हम, आखिर जवाब क्या है,क्यूँ ठानते नहीं हम?? किसकी है कारसाज़ी,खारिज़ हैं सब इरादे, वहम-ओ-सराब क्या है,पहचानते नहीं हम,  कितनी है जिंदगानी,इसको भरम रखा है, इसका हिसाब क्या है,कुछ जानते नहीं हम, गहराई नापते  हैं,कमसिन जवानियों की, हुस्न-ओ-शबाब क्या है!!क्यूँ मानते नहीं हम, लम्बी ज़बान करके,थूका किये सभी को, इसमें खराब क्या है,ये छानते नहीं हम.... उर्मिला माधव ... 9.4.2014...

कहां तक जाते हम

किस-किस को समझाते हम. और कहाँ तक जाते हम, जितनी अपनी हिम्मत थी, उतना ही कर पाते हम, सभी ज़ेह्न  में ज़ह्ऱ लिए, किस पर प्यार लुटाते हम, इतनी अपनी ताब कहाँ, झूठी कसमें खाते हम, अंदर तो ख़ामोशी है, बेजा शक़्ल सजाते हम, अलग-थलग ही बेहतर है, क्यूँ कर बात बढ़ाते हम.. तनहाई तो आदत है, किसके दर पर जाते हम? उर्मिला माधव। 9.4.2017

लफ़्ज़ों का इमला

अगर सच जानना चाहो तो मेरे पास आ जाना, अदब की क्या हक़ीक़त है, तमाशा देखते जाना.. कहाँ लफ़्ज़ों का इमला है, कहाँ नुक़्ता ज़रूरी है, कहाँ किसने पढ़ा किसको, नज़ारा देखते जाना, उर्मिला माधव 9.4.2018

दिखाऊँ क्या-क्या

दाग़-ए-दिल,ज़ख्म-ए-जिगर तुमको दिखाऊँ क्या क्या, रु-ब-रु जो हूं मैं वो तुमको बताऊँ क्या क्या  तुमने इलज़ाम अभी मुझ पे लगा डाले बहुत, अपनी जानिब से तुम्हें दर्द सुनाऊँ क्या क्या, कभी काला तो कभी रंग रंगा  है गंदुम सारे रंगों से अलग हटके बनाऊं क्या क्या, इक शिकायत का ज़खीरा है मेरे दामन में  बरसरे बज़्म तमाशा है जताऊँ क्या क्या...  उर्मिला माधव....

कहां से लाएंगे

मुर्दे हैं, जज़्बात कहाँ से लाएंगे, फ़िर बीते लमहात कहाँ से लाएंगे, ख़ाक हो गए वीराने में जलके जो, रंग रंगीली, रात कहाँ से लाएंगे, ख़ुश्क हो गए, आंसू जिनकी आंखों में, ख़ुशियों की बरसात कहाँ से लाएंगे, कभी हुजूमे मेहमाँ था इस आंगन में, फिर से वो सौगात कहाँ से लाएंगे, उल्फ़त की इफ़रात कहाँ से लाएंगे, जड़े हुए थे चांद सितारे चूनर में, वो जगमग, बारात कहाँ से लाएंगे, तुम अपनी मीज़ान पे रखके मत तौलो, घातों के इलमात कहाँ से लाएंगे, उर्मिला माधव, 5.4.2019

ख़ातून दिल्ली की

लो मेरी दास्तां सुन लो मैं हूँ ख़ातून दिल्ली कीहिली जाती है अब बुनियाद,अफ़लातून दिल्ली की नहीं महफूज़ अस्मत है,के दिल में ख़ास दहशत है क़दम बाहर निकालूँ जो तो बस अंजाम वहशत है समझ में कुछ नहीं आता के किस दर्ज़ा जिया जाए सम्हाले ग़म कोई कितने,ज़ह्र कितना पिया जाये ये दिल्ली आज तक लाशों के अंबारों पे रख्खी है अभी तक आबरू औरत की मीनारों पे रख्खी है न जाने क्या दिया अजदाद ने,दिल्ली को विरसे में मेरा दिल चाहता है काश इसको समझूँ फिर से मैं जहाँ औरत की अव्वल ज़ात को सस्ता समझते हैं करे दिलजोई मर्दों की,यही रस्ता समझते हैं मगर मुझमें भी है सीता,कोई रज़िया कोई राधा बिना मेरी मुहब्बत के वजूद-ए-मर्द है आधा मैं शीरीं हूँ,मैं लैला हूँ,में दुर्गा हूँ,मैं अम्बा हूँ अगर सच जानना चाहो तो मैं चिड़ियों का चम्बा हूँ मगर जब याद आता है के मैं औरत हूँ दिल्ली की बहुत ख़तरे में रहती हूँ,के मैं ग़ैरत हूँ दिल्ली की के मैं औरत हूँ दिल्ली की के मैं औरत हूँ दिल्ली की - उर्मिला माधव

सीख गए

सदमे झेले, बेशुमार पर तनहा चलना सीख गए, सूरज के अंदाज़ में हम भी सीधा ढलना सीख गए दिल पर जब-जब ठेस लगी, दिल टूट गया और सहम गया, पर ख़ामोशी से आरिज़ पर हम गिरया मलना सीख गए, उर्मिला माधव