सड़क पर रहने वाले युवक की मनोव्यथा----- ------------------------------------------------------- अनुष्ठान जब कोई होता, मेरा मन भीतर से रोता , मेरे पास कमीज़ नहीं थी, कोई मुझे तमीज नहीं थी, कहीं अगर जो बाजे बजते , मेरे ख्वाब चौगुने सजते, मन पंछी तब खूब उछलता, जाने को ये खूब मचलता, कोई मुझको नहीं बुलाता, कन्नी काट बगल हो जाता, मेरी कोइ दहलीज़ नहीं थी, मेरे पास कमीज़ नहीं थी, तनहाई में सोचा करता, बिना विचारे क्यूँ नईं सरता? मुझमें दया भाव नईं शायद , बे-मतलब की करूँ कवायद , मेरा वतन गरीब बहुत है, सबका दर्द करीब बहुत है, यह सब कोई चीज़ नहीं है मेरे पास कमीज़ नहीं है, अच्छे दिन आने वाले हैं, बुरे सहज जाने वाले हैं, ये सुन कर मैं हंस लेता था, जो मिल जाए रख लेता था, ऐसा अगर कहीं हो जाए, दिल को ज़रा समझ हो जाए, मेरा कोई हफीज नहीं है, मेरे पास कमीज़ नहीं है... उर्मिला माधव... 29.4.2014...