ज़माना ख़राब है
तिरछी अदा से बात का कहना सवाब है,
कुछ भी नहीं है सह्ल ज़माना ख़राब है,
बच बच के चल रहे हो, कहाँ बच सके मगर,
बेआबरू खड़े हो, यही इक जवाब है,
जिस राह पर चले हैं तहम्मुल से आज तक,
एहसास हो गया है यहीं इज़्तिराब है,
जब तुन्द आंधियों से कभी हम नहीं डरे,
सरमाया ज़िन्दगी का मगर, आब आब है,
उनको गुमान तिफ़्ल हमें जानते हैं वो,
दिल में हसद है मुंह पे बहुत जी जनाब है,
हम मुस्तहक थे फिर भी कभी कुछ नहीं कहा,
अपना वजूद उनको फ़क़त इक हबाब है,
उर्मिला माधव
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