कहां तक जाते हम

किस-किस को समझाते हम.
और कहाँ तक जाते हम,

जितनी अपनी हिम्मत थी,
उतना ही कर पाते हम,

सभी ज़ेह्न  में ज़ह्ऱ लिए,
किस पर प्यार लुटाते हम,

इतनी अपनी ताब कहाँ,
झूठी कसमें खाते हम,

अंदर तो ख़ामोशी है,
बेजा शक़्ल सजाते हम,

अलग-थलग ही बेहतर है,
क्यूँ कर बात बढ़ाते हम..

तनहाई तो आदत है,
किसके दर पर जाते हम?
उर्मिला माधव।
9.4.2017

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