ज़िन्दगी तरसती रही

सुकून-ए-दिल के लिए ज़िन्दगी तरसती रही,
मगर ये सांप सी दुनियां के सिर्फ़ डसती रही,

हमारी रूह ने देखा तो ख़्वाब शीरीं था,
अजब अज़ाब रहा, ज़िन्दगी झुलसती रही,

बड़े ही शौक़ से पहुंचे थे, बर्फ़ के घर में,
मगर लगा के कहीं, आग सी बरसती रही,

किसी भी शै को अगर दिल ने अपना मान लिया,
उलट-पलट के वही, तंज़-ओ-तीर कसती रही,

मुख़ालफ़त को बहुत दूर से सलाम किया
बहुत कमाल वही साथ-साथ बसती रही,
उर्मिला माधव,
20.4.2017

Comments

Popular posts from this blog

गरां दिल पे गुज़रा है गुज़रा ज़माना

kab chal paoge