रोज़ अलग है
तू इक ख़ालिस दीवाना है, मेरी-तेरी सोच अलग है,
अजब तमाशा लगे ज़माना फ़िर रस्तों का खोट अलग है,
दुनिया से थक कर लौटी हूँ, सूने मन में ख़्वाब कहाँ,
नहीं मुकम्मल मंज़र कोई, हंसना रोना रोज़ अलग है,
नए हवादिस रोज़ गुज़रना, समझाना पड़ता है ख़ुद को,
बेकस नज़रें सहम गई हैं, उसपे उड़ता होश अलग है,
उर्मिला माधव
10.4.2019
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