रु ब रु
ख़ूब रु था रु-ब=रु,
जाने क्या थी गुफ़्तगू,
क्यूँ अजब सा है असर,
मिट गई हर आरज़ू,
ख़ाब हो या हो ख़याल,
अब न कोई जुस्तजू ,
आँख ने चाहा जिसे,
हर घड़ी ऑ कू-ब-कू,
ज़िद हमारी सुन ज़रा ,
माहवश ऐ माहरू,
तेरी दुनियां तू समझ,
मेरी दुनियां,अल्ला हू,
जिस्म-जां तनहा सही,
और ग़म भी चार सू ,
मैं रहूँ बस मैं ही में,
तू रहे बस तू ही तू ......
#उर्मिलामाधव ...
20.4 .2015
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