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Showing posts from December, 2019

बिस्मिल मुझे

इस क़दर माज़ूर मत रख,ऐ दिले बिस्मिल मुझे  ज़िन्दगी से दूर मत रख,ख़ालिके आदिल मुझे, ठोकरों के साथ चलना एक दीगर बात है, उम्र भर मजदूर मत रख दे भी दे मंजिल मुझे, दे दिया साग़र-ऑ मीना,और आज़ादी भी दी, होश दे मखमूर मत रख,गर दिया ये दिल मुझे, ये मुक़म्मल बेख़ुदी और दिल भी ज़िद पै आगया, इतना भी मजबूर मत रख,हाशिये महफ़िल मुझे, उर्मिला माधव... 1.1.2015... माजूर--- विवश मखमूर--- नशे में

सकते नहीं

मैं वो पथ्थर हूँ जिसे तुम तोड़ तो सकते नहीं, और फिर आदत भी अपनी छोड़ तो सकते नहीं, आओ फिर इस आग में तुम डूब जाना सीख लो, खौलते दरिया का रुख़ तुम, मोड़ तो सकते नहीं, तपते सहरा में दहकती रेत का अहसास है, ये वो दुनियां है जहां सर फोड़ तो सकते नहीं कुछ हुनर तो हाथ में हैं सिर्फ़ उस करतार के, तोड़ने वाले भी, दिल को जोड़ तो सकते नहीं, उर्मिला माधव

शाम किसका

किस्सा सुना रहे हैं ये वक़्त-ए-शाम किसका, इस गुफ़्तगू में आख़िर उट्ठा है नाम किसका, नामा निगार बनके आया है आज क़ासिद, लाया है देखो ख़त में,किसको सलाम किसका, नीलाम हो रहे हैं जज़्बात हर किसी के बाज़ार में लगाया कब किसने दाम किसका? फ़िरकःपरस्त आक़ा क्या फैसला करेंगे, किस-किस तरह से होगा,जीना हराम किसका? हम जी रहे हैं अब तक ज़िंदादिली के दम पर, करना है जब सभी ख़ुद, फिर एहतराम किसका? उर्मिला माधव.. 30.8.2016

चलना पड़ा अगर

चल पाएंगे कहाँ तक, चलना पड़ा अगर, रस्ते में अपने पांव को मलना पड़ा अगर ? हिम्मत तो कर गए हैं पै फ़िर भी डर है ये, सूरज से पहले हमको, ढलना पड़ा अगर? इक दश्त से गुज़रना पड़ जाएगा हमें जब, शोलों की सुर्ख़ आग पे जलना पड़ा अगर?

दोस्त

उम्र के फ़ासले बहुत हैं दोस्त, पाँव में आबले बहुत हैं दोस्त, ज़ब्त करना हमारी आदत है, ग़ैरों को थाम ले बहुत हैं दोस्त... उर्मिला माधव

भजन कर लिया

एक प्रयास हिंदी में, ------------------- मन हुआ अनमना तो,भजन कर लिया, लेके गंगा का जल आचमन कर लिया, बैठे आसन पे भी पालथी मार कर, जग के हर देवता को नमन कर लिया, जाने कितनी तरह से किया कीर्तन, अपने हाथों से पूरा जतन कर लिया, क्यों ये संसार है सोच कर थक गए, और चिंता को कितना गहन कर लिया, म्रत्यु पर्यंत दूंढा किये सार हम , अंत में मृत्यु का ही वरन कर लिया... उर्मिला माधव... २७.१२.२०१३.

ईमान से

ये अदावत चल रही भगवान से.....ईमान से,  लेना-देना कुछ नहीं इनसान से ....ईमान से, हाँ क़दम बोसी नहीं करते किसीकी भी कभी,  ज़िन्दगी हमने गुजारी शान से ....ईमान से, जाने क्या-क्या रंग दिखलाए ज़माने ने हमें,  जानके हम बन गए अनजान से ..ईमान से, उर्मिला माधव... 27.12.2014

कम ही सही

दिल में सब्र-ओ-क़रार ..कम ही सही, जज़्बा-ए-इख़्तियार ......कम ही सही, उस पे दामन में तार .....कम ही सही, गुल-ओ-चमन-ओ-बहार कम ही सही शुक्र है फ़िक्र तेरे बिन तो हूँ, ख़ूब है ख़ुद से मुत्मइन तो हूँ... उर्मिला माधव... 27.12.2016

सो नहीं सकते

जुनून-ए-ख़ाब भी बाहम है सो नहीं सकते सरापा नींद सा आलम है सो नहीं सकते, हमारी आंख में पानी सा रुक रहा है कहीं, ज़माना आज भी बरहम है, सो नहीं सकते, ये बात है के अभी,अधमरे पड़े हैं कहीं, हमारे जिस्म का मातम है,सो नहीं सकते, हमारे कान में एक नज़्म गूंजती है अभी, बड़ी अजीब सी सरगम है सो नहीं सकते, उर्मिला माधव

आपकी क़सम

दुनियाँ से कुछ मिला भी नहीं...आपकी क़सम, और हमको कुछ गिला भी नहीं,आपकी क़सम, हम उम्र भर निभाया किये...मुश्किलों के साथ,  और इसका कुछ सिला भी नहीं,आपकी क़सम, किस दरज़ा हम जगाते रहे.....कम नसीब को, ये टस से मस हिला भी नहीं....आपकी क़सम, हर तरहा अजनबी थे हर-इक शहर के लिए, जाना कोई जिला भी नहीं....आपकी क़सम,   रहती थी जुस्तजू सी....किसी ख़ास शख्स की,  बस फिर ये सिलसिला भी नहीं आपकी क़सम, --------------------------------------------- duniyan se kuchh mila bhi nahin aapki qasam, aur hamko kuchh gilaa bhi nahin aapki qasam, ham umr nibhaaya kiye mushkilon ke saath , aur iskaa kuchh silaa bhi nahin aapki qasam, kis darzaa ham jagaate rahe qamnaseeb ko, ye tas se mas hilaa bhi nahin aapki qasam, har tarhaa ajnabii the har-ik shahar ke liye, jaanaa koi jilaa bhi nahin.......aapki qasam, rahati thi justjoo sii kisi khaas shakhs kii, phir thaa ye silsilaa bhi nahin,aapki qasam... उर्मिला माधव... 26.12.2013...

जनाब

ये मेरी हस्ती है और मैं हूँ जनाब, आपके कहने से होगी क्यूँ ख़राब, देख कर ऐब-ओ-हुनर इनसान के, क्या बजाते फिरते हो ये मुंह जनाब, मैं भी ग़र कहने पे जो आ जाऊं तो, आप क्या दे पायेंगे पूछूं जवाब ? आप भी अपना गिरेबां झाँक लें, तब समझ में आएगा,ना हूँ नवाब, अपने हाथों से मसल कर आबरू, क्यूँ बढ़ाते हैं मुसलसल यूँ अज़ाब, क्यूँ किसीकी ठोकरों पर हो जहां, आप को समझेगा कोई,क्यूँ नवाब... ------------------------------------------------ Ye meri hasti hai or main hun janab, Aapke kahane se hogi kyun kharaab? Dekh kar aib-o-hunar bas gair ke Kya bajate phirte ho ye munh janab Main bhi gar kahne pe jo aa jaaun to, Aap kya de paayenge phir yun jawaab, Aap bhi apna girebaan jhaank len, Tab samajh main aayega lubbe luwaab, Apne hathon khud masal kar aabruu Kyun badhaate hain musalsal yun azaab, Kyun kisiki thokron par ho jahaan, Aap hii ko samjhe koii kyun navaab... #उर्मिलामाधव... 26.12.2015

नज़्म एक जुगनू

एक जुगनू था,शह्र अनजान था, उसको उड़ना था मगर हलकान था, किस जगह पर सांस ले,बैठे कहाँ, और क़दम बोसी करे,किसकी कहाँ, फिर भी आख़िर वो क़दम भी चुन लिए, जिनमें अपने ख़्वाब जाकर बुन लिए, उर्मिला माधव

ख़ुश हैं

Madhuvan Rishiraj की लिखी हुई अद्भुत ग़ज़ल... बस शहीद ही मर के खुश हैं बाकी सब तो डर के खुश हैं हाय ज़माना कैसा आया... कातिल दुनिया भर के खुश हैं कोई बात जो इनकी सुन ले शायर मुजरा करके खुश हैं फौजी सरहद पर हैं मरते सांप हमारे घर के खुश हैं नीचे क़त्ले आम सही पर आक़ा सब ऊपर के खुश हैं सब के सब ये भूख के मारे सामने तेरे दर के खुश हैं तेरी गली में मौत बिछी है फिर भी यार गुज़र के खुश हैं -MR

सलामत नहीं है

अभी तक तेरे सर पे शामत नहीं है, क्या ये ज़िन्दगी की निजामत नहीं है?? मुहब्बत किसीसे अगर हो ही जाए , वो बस हादसा है नियामत नहीं है , जो दिल आगया ग़र तुम्हारा किसीपे , तो फिर एक दिन भी सलामत नहीं है , अभी तक तो एक घर भी ऐसा न देखा , जहां दिल पे लानत मलामत नहीं है , फकीरी की चादर अगर मुंह पे ढक ली , तो कुछ भी ,गुज़रना क़यामत नहीं है.. '''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''''' abhi tak tere sir pe shaamat nahii hai, kya ye zindagi kii nizaamat nahin hai?? muhabbat kisise agar ho hii jaaye, wo bas haadsaa hai niyaamat nahin hai, jo dil aagayaa gar tumhaara kisiipe, to phir ek din bhi salaamat nahin hai, abhi tak to ek ghar bhi aisaa na dekhaa, jahaan dil pe laanat,malaamat nahin hai, faqirii ki chaadar agar munh pe dhak lii, to ku...

जिये जा रहे हैं

उसी जुस्तजू में जिए जा रहे हैं, जो कह कर गए थे के ले जा रहे हैं, हमीं ने तो इज्ज़त भी बख्शी थी उनको, वही वार हम पर किये जा रहे हैं, कभी कितने ख़ुश थे,मगर आज बोले, ज़ह्र ज़ीस्त है और पिए जा रहे हैं, वो ज़ह्र-ए-ज़ुबां उनका अब तक है तारी, के हम ज़ख्म अपने सिंये जा रहे हैं, अजब हाल है उनके गुलशन का देखो, हवा में भी पत्थर, दिए जा रहे हैं.... ----------------------------------------------------. usii justjoo main jiye ja rahe hain, jo kah kar gaye ke le ja rahe hain, hami ne to izzat bhi bakhshi thi unko, wahi waar ham par kiye ja rahe hain, kabhi kitne khush the,magar aaj bole, zahr zeest hai or piye jaa rahe hain, wo zahr-e zubaan unka ab tak hai taari, ke ham zakhm apne sinye ja rahe hain, ajab haal hai unke gulshan ka dekho, hawa main bhi paththar diye ja rahe hain.... #उर्मिलामाधव.. 24.12.2015

कम क्या करें

दुश्मनी का तज़किरा हम क्या करें, बढ़ चुका ये मसअला, कम क्या करें, जो हुआ है वो ही तो होना था बस, इसके ऊपर अब भला ग़म क्या करें, गम की दुनियां और ये रंग-ए-मौसिक़ी, उड़ना है तो हौसला कम क्या करें, उर्मिला माधव

दुनियादारी देख

आंखें बड़ी-बड़ी कर प्यारे आजा दुनियांदारी देख, बहुत-बहुत मीठे लफ़्ज़ों में छुपी हुई हुशियारी देख, बहुत हुलस कर लिपटने वाले क्या-क्या रखते हैं दिल में, दांत दिखा कर मिलने वालों की तू कारगुज़ारी देख, जीते हैं बस अपनी ख़ातिर,इनको  ग़रज़ किसीकी कब, खुल कर हंसने वालों की बस छुपी हुई मक्कारी देख, इनके दिल में किसी का दर्ज़ा, समझोगे तो ख़ाक नहीं, जिन यारों से इन्हें मुहब्बत,उनसे आपस दारी देख, ये कब दोस्त हुए हैं किसके,वक़्त पड़ा तो आन मिले, आस्तीन में होगा खंजर संम्भल ज़रा ग़द्दारी देख... ऐसा नहीं है इस दुनियां में नफ़रत ही है, प्यार नहीं, ऐसे भी हैं लोग यहां पर, इनकी सबसे यारी देख... उर्मिला माधव 24.12.2017

ख़ुदा ये

क्यूँ दिखाता है भला इतनी अदा ये ?? कौनसी दुनियाँ मैं रहता है खुदा ये ?? कोई मरता है तो मरता जा रहा है,  चाहे जितना मौत से घबरा रहा है, अहमियत अपनी महज दिखला रहा है, दिल जिगर पे चोट करता जा रहा है, सबको ये मालूम है तू ही ख़ुदा है, क्या कहें तेरा रवैय्या ही जुदा है... --------------------------------------- kyun dikhaata hai bhalaa,itni adaa ye ?? kaunsii duniyaan main rahta hai khuda ye?? koii martaa hai to martaa ja raha hai, chaahe jitnaa maut se ghabraa rahaa hai, ahmiyat apni mahaj dikhlaa rahaa hai, dil,jigar pe chot kartaa jaa rahaa hai, sabko ye maloom hai too hii khudaa hai, Kya jahen tera ravaiyya hi judaa hai... उर्मिला माधव... २३.१२.२०१३...

निभाले मुझको

गिरह्बंद शेर----- सुन दुआ मेरी ज़रा और निभाले मुझको, अब मज़ा देने लगे पाँव के छाले मुझको.... --------------------------------------------- sun duaa merii .........zaraa or nibhaale mujhko, ab mazaa dene lage paanv ke chhaale mujhko... Urmila Madhav.... 23.12.2014..

धुआं धुआं

ज़िन्दगी धुंआ-धुंआ, आदमी धुंआ-धुंआ, ज़िन्दगी की राह में, हर ख़ुशी धुंआ-धुंआ..... जो नज़ारे जल्वागर हैं, उनमें कुछ मज़ा नहीं, बेसबब समझ रहा है, ज़िन्दगी सज़ा नहीं, बेकसी की राह में, सादगी धुंआ-धुंआ..  उर्मिला माधव.. 23.12.2016

कर न सके

मेरी नज़र का कोई एहतराम कर न सके, अजब कमाल रहा एक काम कर न सके, वक़ार मेरी मुहब्बत का पुर कुशादह है, कमाल तुम हो के उठके सलाम कर न सके, उर्मिला माधव.. 22.12.2016
मैंने सोचा ही नहीं हिन्दू या मुसलमां होकर, दिल-ए-हस्सास मेरा निकला महज़ हां होकर, मेरे नज़दीक जो आया था गोल टोपी लिए, खाना लेना है मुझे जाऊं कहां यां होकर ? एक मज़लूम था बच्चा जो मेरी बाँहों में, और सब भूल गई सोचा फ़क़त मां होकर, उर्मिला माधव, 22.12.2017

है ही नहीं

आपका संजीदगी से राब्ता है ही नहीं, इसके आगे फ़िर कोई भी रास्ता है ही नहीं, उन दयानतदारियों का ज़िक्र करके क्या करूँ आपको अच्छाइयों का कुछ पता है ही नहीं उर्मिला माधव, 22.12.2017

डूबे हुए

khwahishon ke rang main doobe huye, jii rahe hain log sab oonghe huye, ab kahan ho,kaise ho,kya haal hai, biit jaayen sadiyan bin poochhe huye, mahfilon main baithte to hain zaroor, muskuraate hoth,dil roothe huye, waah-waah kya baat hai,kya sher hai, daad haazir,lab magar,sookhe huye, aajkal ye hii masheenii taur hai, muskuraaye,chal diye,rookhe huye, उर्मिला माधव... 22.12.2015

दुकान किताब वाले की

दुनियां का मेला, दुकान, किताब वाले की, चिल्लाता हुआ, किताब वाला, हॉकर की तरह, समझाता हुआ, अशिक्षितों को, मुफ़्त ज्ञान है, घर ले जाओ, आज नहीं तो कल सही, सीख ज़रूर जाओगे, नहीं तो समझ जाओगे, पढ़े हुओं की किताब, अनपढ़ों को बेचते हुए, काम बदलने को, सोचता हुआ, किताब वाला, और नेट की दुनियां, दुनियां का मेला .. उर्मिला माधव 20.12.2017

फ़ासला नहीं है

मैं ज़मीन पर खड़ी हूँ, किसी आसमान जैसी, ये वो फ़र्क़ है कि जिसमें कोई फ़ासला नहीं है मैं जहां से देखती हूँ, वहां आ सका न कोई, ये वो जुरअतें है जिनका, तुम्हें हौसला नहीं है, उर्मिला माधव

हलकान है

कोई भी ग़ुज़रा नहीं है रहगुज़र सुनसान है, वास्ते मेरे मगर.........हर ज़र्रे में तूफ़ान है, क्या कहूँ अब जा ब जा घुटने लगा है दम बहुत, मेरे गम को देख कर वाद-ए-सवा हलकान है, चीखती रहती है...मेरी आह मेरी रूह में, और बाकी है कहानी ये महज उन्वान है, एक पत्थर,तोड़कर दिल,होगया है अब ख़ुदा, मेरा दिल ग़ाफ़िल रहा कि वो बहुत इंसान है, उसने तोहफ़े में दिए जो आहो नाले रंजो,ग़म, मेरे घर में आजतक अब तक वही सामान है.... -------------------------------------------- koii bhi guzra nahin hai rahguzar sunsaan hai, wwaste meremagar,har zarre main toofaan hai, kya kahun ab ja-b-ja ghutne lagaa hai dum bahut, mere gum ko dekh ka....waad-e-saba halkaan hai, cheekhtii rahti hain.....meri aahen,meri rooh main, or baaki hai kahaani...........ye mahaj unvaan hai, ek paththar,tod kar dil.......hogaya hai ab khudaa, mera dil gaafil rahaa.........ki wo bahut insaab hai, usne tohfe main diye jo aah-o-naale ranj-o-gum, mere ghar main aaj tak ab tak wahi saamaan hai Urmila Madhav.. ----------उर्मिला माधव------------ 17...

हर नफ़स

जा तुझे अय ज़िन्दगी अब हर नफ़स ठुकरा दिया, अपने हाथों हमने अपने वक़्त को चलता किया, हर क़दम पर आबलों के नाम लिख्खे हैं अभी, ज़ेह्न से एक आह निकली उसमें सब दफना दिया, ख़ुद तमाशा कर दिया,लो हमने अपनी मौत को कुछ दयानतदार आये,रूह को क़फ़ना दिया, जिस शनासाई का दावा हर क़दम करते थे हम, उन मोअज़्ज़िज़ दोस्तों ने,दोस्त को रुसवा किया... उर्मिला माधव

कमाल होते हुए

लोग जब ख़ुश हो रहे थे, इस्तेमाल होते हुए, हमने बस हैरत से देखा ये कमाल होते हुए, उर्मिला माधव

आलम होता है

खिराज ए अक़ीदत  Satyaprakash Sharma sir  😢😢😢😢😢 कभी-कभी एक ऐसा आलम होता है दुनियां का हर लम्हा मातम होता है, कानों में आवाज़ कोई भी नईं जाती, सबका मिलके चिल्लाना कम होता है उर्मिला माधव

तमाम होते हैं

हादसे सुब्ह-ओ-शाम होते हैं, रोज़.....रिश्ते तमाम होते हैं, अपने अखलाक़ पे,नज़र ही नहीं, दाग़........लोगों के नाम होते हैं, जो भी चाहा जुबां से कह डाला, और तब क़त्ल-ए-आम होते हैं, ये जो मजमा लगाया करते हैं, इनके...लफ़्ज़ों के दाम होते हैं, जो हैं दिल से दिमाग़ से शातिर,   उनको....झुकके सलाम होते हैं, ================= hhadse subh-0-shaam hote hain, roz......rishte tamaam hote hain, apne akhlaaq pe nazar hi nahin, daagh logon ke naam hote hain, jo bhi aaya zubaan se kah daalaa, or tab........qatl-e-aam hote hain, jo ye majmaa lagaaya karte hain, inke.....lafzon ke daam hote hain, jo hain dil se dimaagh se shaatir, unko...jhuk ke salaam hote hain.... Urmila Madhav.. उर्मिला माधव... १६.१२.२०१३..

कच्चा किया

सख़्त दिल को कूट कर कच्चा किया, बोझ दिल का कम अज़ कम हल्का किया, चाह कर भी रो नहीं पाते थे हम, चश्म-ए-गिरया के लिए रस्ता किया, एक ये एहसान भी कुछ कम नहीं, हर क़दम पर ग़म मेरा रुसवा किया, दिल ही दिल में कब तलक, घुटता कोई, काम कुछ दरअस्ल अब अच्छा किया... उर्मिला माधव... 16.12.2016

डर ही नहीं

दिल किसी ग़म से पुर असर ही नहीं, दुनियां वालों का हमको डर ही नहीं, पहरा देते हैं अब ये शम्स-ओ-क़मर, इस ज़माने को ये ख़बर ही नहीं, सब के सब पर भी काट सकते थे, बेबसी उन की हमको पर ही नहीं, अपने लहजे में है कसैला पन, कहने सुनने को कुछ कसर ही नहीं किसकी जुरअत है इसको तड़पा दे, इतना कमज़ोर दिल का घर ही नहीं, उर्मिला माधव 16.12.2017

झूठ पर उतर आया

ज़रा सी बात थी वो झूठ पर उतर आया, बला का सच था बड़ी दूर तक नज़र आया, ज़ुबां को बंद रखा मैंने कुछ कहा ही नहीं, तो सारी उम्र मिरी ज़ीस्त पर असर आया... वो एक रंग महज़ जिसकी मुझको आदत थी, सो मेरे हिस्से वही ग़म का इक सफ़र आया, वो जिसके टूट के गिरने से डर रहे थे सभी, कमाल ये कि उसी शाख़ पर समर आया, Zara si baat thi wo jhuth par utar aaya, Balaa ka sach tha, badi door tak nazar aaya, ZubaaN ko band rakha maine kuchh kaha hi nahin, To saari umr meri zeest par asar aayaa, Wo ek rang mahaz jiski hmujhko aadat thi, So mere. Hisse wahi gham ka ik safar aayaa.. Wo jiske tuut ke girne se dar rahe the sabhi, Kamaal ye ke usi shaakh pe samar aayaa.... Urmila Madhav

चुभता रहा

उम्र भर जिसकी हिफाज़त दिल ने की, ख़ार की मानिंद .......क्यों चुभता रहा !!!!! दिल हमारा बे-अदब था .....क्या कहें,  बे-वफ़ा की सम्त ही ......झुकता रहा.. उर्मिला माधव.... 13.12.2014....

वाह वा अपना हिंदुस्तान

हर दिल में ख्वाहिश है बाक़ी,रोटी,कपडा और मकान, चलो लगाएं नारा मिलकर,वाह-वाह अपना हिंदुस्तान, दाल-वाल क्या करेंगे खाकर,पांच सितारा होटल है क्या, सूखी रोटी खाकर बोलो,वाह-वाह अपना हिन्दुस्तान , कितनी बढ़िया,गाय,भैंस हैं,कट जाती हैं,बिन कुछ बोले, चुप रहकर कट जाओ,बोलो,वाह-वाह अपना हिन्दुस्तान सत्ताधीशों की मजबूरी,समझ नहीं क्यों आती सबको, ग़ुरबत में रहकर भी कहते,वाह-वाह अपना हिन्दुस्तान, वतन की ख़ातिर, मिटने वाले सीख गए हैं,मरके जीना, मरते-मरते बोल गए सब,वाह-वाह अपना हिन्दुस्तान... #उर्मिलामाधव 13.12.2015

रातें उधार लेकर

एक मतला ---2 शेर.. आँखों में जागता है,रातें उधार लेकर, सहरा को नापता है,आँखें उधार लेकर, दस्तार में छुपी है,शायद वो अक़्ल होगी, दुनियां को आंकता है,बातें उधार लेकर, खोया हुआ है इंसां, फितरत की तीरगी में, हर-हर में झांकता है,साँसें उधार लेकर..... उर्मिला माधव, 13.12.2016

तसवीर है

जो तुम्हारी ख़ास एक तस्वीर है, वो मेरे दिल की अजब ज़ंजीर है, वो मुझे अपनी सी लगती है सुनो, उसकी सीरत इन्तेहाई शीर है, बिन तुम्हारे दिल बहुत बेचैन था, ये महज़ बिछड़े दिनों की पीर है, रात दिन बाबत तुम्हारे सोचना, क्यूँ मेरे दिल पै रखी शमशीर है, लौट कर आना तो उनको है नहीं, तयशुदा है बस यही तक़दीर है,... उर्मिला माधव... 18.11.2015

ग़म छुपाते हैं

बहुत...जो मुस्कुराते हैं, असल में ग़म छुपाते हैं, ज़ुबां...ख़ामोश रखते हैं, सभी रिश्ते....निभाते हैं, हज़ारों......दर्द सहते हैं, अकेले.......टूट जाते हैं, bahut jo........muskuraate hain, asal main gum chhupaate hain, zubaan khaamosh rakhte hain, sabhi rishte.......nibhaate hain, hazaaron........dard sahte hain, akele...............toot jaate hain... उर्मिला माधव... १२.१२.२०१३..

मंसूब हो जाएं

इबादत से अगरचे हम.....बहुत मंसूब होजाएं, तो लाज़िम है ज़माने की नज़र में खूब हो जाएं, किसी दिल में क़दम रखना भी कार-ए-पुख्ता कारा है, ज़रा नज़र-ए-इनायत हो......कि बस महबूब हो जाएं, हज़ारों जान से कुरबान होने पर भी क्या हासिल, मज़ा तो तब है जबकि......दर्द के उस्लूब होजाएं, हम अब भी आज भी अपने जिगर में ताब रखते हैं, अगर जो जिद पे आजाएं...तो बस मतलूब हो जाएं... उर्मिला माधव 11.12.2013.. उस्लूब--- आचरण  मतलूब---प्रेमी ibaadat se agarche hum bahut mansoob ho jaayen, to laazim hai zamaane ki nazar main khoob ho jaayen, kisi dil main qadam rakhna bhi kaar-e-pukhtaa kara hai, zara nazar-e-inaayat ho.......ki bas mahboob ho jaayen, hazaaron jaan se qurbaan hone par bhi kya haasil   ?? maza to tab hai jabki dard ke.....usloob ho jaayen, hum ab bhi,aaj bhi apne jigar main taab rakhte hain, agar jo zid pe aajaayen to bas.....matloob hojaayen... Urmila Madhav... 11.12.2013..

होने के बाद मतला

मुस्कुराएं आंख नम होने के बाद, ये कहाँ मुमकिन है ग़म होने के बाद, उर्मिला माधव

रखते हैं क़दम

जो अहले ज़र्फ़ हैं वो सोच के रखते हैं क़दम, वगरना हैफ़ से इनसान को तकते हैं क़दम, अभी भी वक़्त है इनसान ख़ुद संभल जाए, कभी तो राह में हर हाल में थकते हैं क़दम... उर्मिला माधव 11.12.2017

नसब करता है

तू बता कौन है क्यूँ ज़िक्रे नसब करता है ? दिल तो हर हाल में तूफ़ान तलब करता है, मैं नहीं कुछ भी मुझे होश कहां दुनियां का, ये पता होता नहीं, कौन है कब करता है जाने हम कितने करिश्मों से गुज़र जाते हैं, जो भी होता है ये हर हाल में रब करता है, उर्मिला माधव 11.12.2018

सिला देता था

जलते लफ़्ज़ों से बहुत ख़ूब सिला देता था, हाँ मगर ये है...मुझे रब से मिला देता था,  :: jalte lafzon se......... bahut khoob sila deta tha, haan magar ye hai mujhe rab se mila deta tha, :: उसकी चाहत में बहुत दूर तलक जाती थी, वो मुझे ज़ह्र-ए-जुबां दिल से पिला देता था, :: uskii chaahat main bahut door talak jaatii thii, wo mujhe zahr-e-zubaan dil se pilaa deta tha, :: मैं तो बस ये के .....तग़ाफ़ुल को हवा देती थी, दिल की बुनियाद मगर फिर भी हिला देता था,  :: main to bas ye ke tagaaful ko hawa deti rahii dil kii buniyaad magar phir bhii hilaa detaa thaa, :: मैं यतीमों में, ...नहीं पैदा हुई, ....अच्छा हुआ, उसको ग़फ़लत ही रही,मुझको जिला देता था, :: main yatiimon men nahin paida hui achha hua, usko gaflat hii rahi.......mujhko jilaa detaa thaa, :: उसकी तबियत पे रहा,ज़िक्र-ए-वफ़ा हो के न हो, हाँ नए ज़ख्म मगर ............रोज़ खिला देता था... :: uski tabiyat pe rahaa,zikr-e-wafaa,ho ke na ho, haan naye zakhm magar,roz khilaa detaa thaa..... #उर्मिलामाधव.. 10.12.2015

चमन की ख़ुश्बू

दिल को भाती है बहुत,गुल-ओ-चमन की खुश्बू  सबसे आला है मगर पाक़ ज़ेहन की ख़ुशबू ये जुबां कुछ भी कहे,साफ़ नज़र आता है, सबकी चाहत है फ़क़त,चैन-ओ-अमन की खुश्बू, वो मिला आज मुझे,यूँ ही अबस कहने लगा, याद क्यूँ आने लगी ख़ाक -ए- वतन की खुश्बू,  ये मुहब्बत है मगर इतना समझना है तुझे, तुझसे आती है मुझे ख़ास बहन की खुश्बू , वो फसीलें भी सजाई जो कभी  ख़ुद मैंने, और वो रेहान,वो घर के सहन की खुश्बू, होके काफ़ूर,है उड़ जाए,मुहब्बत की फ़ज़ा, शाही दस्तार से ग़र आये कफ़न की खुश्बू..... #उर्मिलामाधव... 10.12.2016..

आहट है

क्या ख़बर तुझको,क्या हकीक़त है, ज़िन्दगी ......मौत की ही आहट है, यूँ मयस्सर हज़ार खुशियाँ हैं , पर कहीं इसमें कुछ मिलावट है, मिलने वाले हज़ार मिलते हैं, वो नहीं,जिसकी हमको चाहत है, राम कहले रहीम कह ले पर,  रोज़-ए-महशर असल  इबादत है, एक तमाशा है जिंदगानी भी  जिसकी खातिर अज़ीम शिद्दत है, जो न पैदा अगर हुआ होता, कौन कहता के चल बुलाहट है? #उर्मिलामाधव.. 7.12.2015

गिनाते हुए

तीन शेर  अजीब हाल में रहने लगे थके से क़दम, मलाल दिल को रहा आबले छुपाते हुए.. कभी हुआ ही नहीं हमसे जिन ग़मों का हिसाब, ज़माना रोने लगा वो सफ़हे गिनाते हुए, जो चाहता था मिरी रूह से बातें करना, वो रो पड़ा था मुझे मर्सिया सुनाते हुए, उर्मिला माधव, 7.12 2017

तनहाई ख़ुद ब ख़ुद

पैदा किया है आलमे तनहाई ख़ुद बख़ुद, देखी है हमने वहशते रुसवाई ख़ुद बख़ुद जो-जो हुआ है वो ही तो होना था दोस्तो, जब ज़िन्दगी के हो गए शैदाई ख़ुद बख़ुद, इक फ़ासले के साथ ही चलने की ज़िद हुई, मशहूर ख़ुद को कर दिया, हरजाई ख़ुद बख़ुद, बेलौस चलते-चलते भी डरने लगे थे हम, धड़कन हज़ार हादिसे ले आई ख़ुद बख़ुद, दानिशवरों की भीड़ का हुज्जूम इक तरफ़, हद-हद से बढ़ के आ गई दानाई ख़ुद बख़ुद, इस उम्र भर की दौड़ का हासिल था एक दिन, महशर के रोज़ बढ़ गई रानाई ख़ुद बख़ुद, उर्मिला माधव 7.12.3018

चढ़ाई जा रही है

Aug 05, 2015 7:58am   क़ब्र पर मिट्टी चढ़ाई जा रही है, लाश कुछ गहरी दबाई जा रही है, लग रही है रेत मुट्ठी से फिसलती , हाथ से निकली ख़ुदाई जा रही है, उफ़ पसीना आगया कैसा जबीं पर, ज़िन्दगी भर की कमाई जा रही है, देखना है चश्म-ए-गिरियाँ में उतर कर, किस तरफ़ ये रहनुमाई जा रही है, दोष पै सर को उठा कर चल रहे हैं, आँख लेकिन नईं उठाई जा रही है ज़िन्दगी देकर हमें बख्शी है दोज़ख, यार को जन्नत दिखाई जा रही है, शोर मदफन से उठा है फिर अचानक, फिर कोई तुरवत सजाई जा रही है।

बचा है

ज़िन्दगी भी हर नफ़स इक हादसा है, ये बता कितना सफ़र, बाक़ी बचा है ? Zindagi bhi her nafas ik hadsa hai, Ye bata,kitna safar baqi bacha hai? उर्मिला माधव

बताते हुए

सहम गया है अभी आंखें नम दिखाते हुए के जो गया था मुझे इश्किया बताते हुए, जो चाहता था मिरी रूह से बातें करना, वो रो पड़ा था मुझे मर्सिया सुनाते हुए, हिसाब हमसे कहाँ हो सका किसी ग़म का, ज़माना रोने लगा ख़ुद वरक़ गिनाते हुए, उर्मिला माधव

आ रही है

हवाओं में साज़िश घुली आ रही है, सखावत की रंगत धुली जा रही है, मुहब्बत को मीज़ान पर क्या रखोगे, ज़का से लक़ा तक तुली आ रही है, अमानत में तुमने जो की है ख़यानत वो पोशीदगी भी खुली जा रही है उर्मिला माधव 5.12.2016

हैरान हूं

पंछियों के रूप से,ऑ हर सुबह की धूप से, कोयल की मीठी कूक से,दिल में उठती हूक से, हैरान हूँ !! हैरान हूँ !! दिल में छुपी कटार से दुनियाँ की मीठी मार से, पत्थर पै चढ़ते हार से,हो क़रम की गुहार से, हैरान हूँ !! हैरान हूँ !! चढ़ती हुई बहार से,ढलते हुए ख़ुमार से, वक़्त की रफ़्तार से, बे-वजह ग़ुफ़्तार से, हैरान हूँ !! हैरान हूँ !! दर्द के इज़हार से,कभी बे-वज्ह ही क़रार से, यहाँ ज़ख़्म बे-शुमार से ऑ जिस्म-ए-ज़ार-ज़ार से, हैरान हूँ !! हैरान हूँ !! उफ़ ज़िन्दगी की हार से,ऑ मौत के वक़ार से, लुटती हुई बहार से,सजते हुए मज़ार से, हैरान हूँ !! हैरान हूँ !!.... उर्मिला माधव... 23.9.2014..

सजाते हैं

Ek nazm Aaj almaariyan sajaate hain, Kal achanak hi ujad jaate hain, Kuchh padosi nayi muhabbat se, Jyon hi milte hain,bichhad jaate hain, Zindagani ajab si mushkil hai, Dere lagte hain ukhad jaate hain, Dard insaaN ki ek kasauti hai, Lafz likhte hain bigad jaate hain Urmila Madhav. 5.12.2017

हवा चमन की

जो चमन की मुझको हवा लगी, ये मैं क्या बताऊँ कि क्या लगी?? कोई शाख ज़ोर से जो हिल गयी , वो तो गुल गिरा के सम्हल गयी, कोई गुल मगर था कुचल गया, मेरे दिल से आह निकल गयी, -------------------------------- jo chaman ki mujhko hawaa lagii ye main kya bataaun ki kyaa lagii, koii shaakh zor se jo hil gayii, wo to gul giraa ke samhal gayii, koii gul magar tha kuchal gayaa, mere dil se aah nikal gayii... उर्मिला माधव... ३.१२.२०१३..

दौर था

आपकी अपनी कलम थी या वो कोई और था? गालियां झड़ती थीं जिससे,वो भी कोई दौर था ? जब मुहब्बत की उम्मीदें, ..ख़ाक में पिनहां हुईं किस क़दर पहुंची थीं चोटें, इसपे कोई गौर था? आज घर खलिहान के किस्से सुनाते हो किसे ? उन दिनों क्या बात कहने का भी कोई तौर था ? उर्मिला माधव  3.12.2016

होता है

दिल ये जब ज़ार-ज़ार रोता है, कौन तब ...ग़मगुसार होता है..... ? शीरीं लफ़्ज़ों की मारा मारी में, यूँ ही दामन फ़िगार होता है, उर्मिला माधव... 2.11.2014...

तुम नहीं

हां मैं तनहा हूँ मगर ...ग़ाफ़िल नहीं, तुम नहीं तो ज़ीस्त का साहिल नहीं, इंतिहाई ज़ियादती है .......मुझपे ये, अब ये मेरा .दिल भी मेरा दिल नहीं, तुमसे मेरी ज़ात है और तुम नहीं, आओ देखो रात है और तुम नहीं... उर्मिला माधव .. 2.12.2016

निभाना आता है

मुझको ग़म में ख़्वाब सजाना आता है, उल्फ़त का दस्तूर निभाना आता है, कोई साज़िश रचके रुसवा ख़ूब करे, आगे बढ़कर प्यार दिखाना आता है, फ़र्क़ समझना आजाता है पल भर में, हंस हंस के हर बात भुलाना आता है, चश्म-ए-गिरियाँ पलकों में ही रहते हैं, ग़म का हर सैलाब छुपाना आता है, तहज़ीबें महदूद मुझे कर देती हैं, मुझको भी सुर्ख़ाब उड़ाना आता है... उर्मिला माधव... 2.12.2016..

दे रही है सदा

चराग़ बुझने लगे,नींद अब कहाँ है बता, न जाने कब से मेरी आँख दे रही है सदा, कहाँ सुकून,कहाँ ज़ब्त औऱ ये ख़ामोशी, हयात कब से मुझे यूँ ही दे रही है सज़ा, क़यास-ए-कल्ब मेरा और अदा ज़माने की, ये तीरगी भी फ़क़त ग़म को दे रही है हवा, उर्मिला माधव